

Sonam Wangchuk Discharged From Medanta: लद्दाख के प्रसिद्ध एक्टिविस्ट और सुधारक सोनम वांगचुक एक बार फिर चर्चा के केंद्र में हैं। पेपर लीक जैसे गंभीर मुद्दे पर सरकार को झुकाने और युवाओं की आवाज बुलंद करने के बाद, वांगचुक आज सोमवार (27 जुलाई, 2026) को गुरुग्राम के मेदांता अस्पताल से डिस्चार्ज होने जा रहे हैं। उनकी सेहत में सुधार और आंदोलन की सफलता के बाद अब सबकी नजरें उनके अगले कदम पर टिकी हैं।
सोनम वांगचुक ने पेपर लीक के खिलाफ अपनी लड़ाई 28 जून को दिल्ली के जंतर-मंतर से शुरू की थी। उन्होंने छात्रों के भविष्य के साथ हो रहे खिलवाड़ को रोकने के लिए अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल का रास्ता चुना। लगातार 26 दिनों तक वह बिना अन्न के रहे, जिसके चलते उनकी सेहत लगातार गिरती गई। आंदोलन के दौरान 18 जुलाई को पुलिस ने उन्हें जंतर-मंतर से उठाकर सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराया था, लेकिन बाद में दिल्ली हाई कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद उन्हें मेदांता अस्पताल में शिफ्ट किया गया।
वांगचुक का यह आंदोलन रंग लाया और सरकार को उनकी मांगों के आगे झुकना पड़ा। 24 जुलाई की देर रात को सोनम वांगचुक ने अपना अनशन समाप्त किया। उन्होंने केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा के हाथों जूस पीकर अपना 26 दिनों का पवित्र उपवास तोड़ा। वांगचुक ने स्पष्ट किया कि कई शर्तों पर लंबी बातचीत और देश में संभावित हिंसा को टालने के उद्देश्य से उन्होंने अपना आंदोलन समाप्त करने का निर्णय लिया है।
सोनम वांगचुक ने इस पूरे घटनाक्रम को 'लोकतंत्र की जीत' बताया है। इस आंदोलन का ही असर था कि शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा। जंतर-मंतर पर करीब 36 दिनों से चल रहा विरोध प्रदर्शन भी शनिवार को समाप्त हो गया। वांगचुक ने ट्वीट कर इस जीत का श्रेय देश की युवा पीढ़ी यानी Gen Z को दिया और इसे शांति, धैर्य और दृढ़ता की विजय बताया।
मेदांता अस्पताल से बाहर आने के बाद सोनम वांगचुक का कार्यक्रम तय हो चुका है। जानकारी के अनुसार, अस्पताल से डिस्चार्ज होकर वह सीधे राजघाट जाएंगे। वहां वह महात्मा गांधी को नमन करेंगे और उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करेंगे। उल्लेखनीय है कि 28 जून को अपना अनशन शुरू करने से पहले भी वह गांधी जी का आशीर्वाद लेने राजघाट ही पहुंचे थे।
महात्मा गांधी को नमन करने के बाद सोनम वांगचुक दिल्ली से अपने गृह राज्य लद्दाख के लिए रवाना हो जाएंगे। लद्दाख के लोगों और देशभर के युवाओं ने उनके इस साहस की सराहना की है। सोशल मीडिया पर भी उनके समर्थन में संदेशों की बाढ़ आ गई है, जहां लोग उनके 26 दिनों के 'सर्वोच्च बलिदान' के लिए उनका आभार व्यक्त कर रहे हैं।
सोनम वांगचुक का यह आंदोलन केवल एक व्यक्ति की जिद नहीं, बल्कि करोड़ों छात्रों की उम्मीदों की जीत के रूप में देखा जा रहा है। अस्पताल से उनकी विदाई और लद्दाख वापसी इस संघर्ष के एक महत्वपूर्ण अध्याय का समापन है।