

Highlights
शनिवार की सुबह दिल्ली की हवा की गुणवत्ता बहुत खराब श्रेणी में बनी रही।
कुल वायु गुणवत्ता सूचकांक 400 से अधिक दर्ज किया गया
राजधानी के कई हिस्सों में प्रदूषण का स्तर बहुत गंभीर बना रहा।
Delhi Air Pollution Update: दिवाली से पहले दिल्ली में की वायु गुणवत्ता ‘बहुत खराब’ (Very Poor) श्रेणी में बनी हुई है। 7 नवंबर 2026 को शहर का औसत एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) लगभग 340 से 365 के बीच दर्ज किया जा रहा है। कई निगरानी केंद्रों पर यह आंकड़ा 400 के पार जाकर ‘गंभीर’ श्रेणी में पहुंच गया है।
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के आंकड़ों के अनुसार, IIT दिल्ली, पंजाबी बाग, विवेक विहार, मुंडका, जहांगीरपुरी और रोहिणी जैसे इलाकों में AQI 400 से ऊपर दर्ज किया गया है। कुछ जगहों पर यह 430-440 तक पहुंच गया।
आज दिल्ली की हवा में मुख्य रूप से PM2.5 और PM10 प्रदूषक सक्रिय हैं। ये महीन कण सांस के जरिए शरीर में पहुंचकर स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाते हैं। सर्दियों की शुरुआत, वाहनों का धुआं, निर्माण गतिविधियों और आसपास के क्षेत्रों से आने वाले प्रदूषण के कारण स्थिति खराब बनी हुई है।
‘बहुत खराब’ और ‘गंभीर’ श्रेणी की हवा में लंबे समय तक बाहर रहने से सांस लेने में तकलीफ, आंखों में जलन, गले में खराश और सिरदर्द जैसी समस्याएं हो सकती हैं। बच्चों, बुजुर्गों और अस्थमा या हृदय रोग के मरीजों को विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। डॉक्टर सलाह देते हैं कि बाहर निकलते समय N95 मास्क जरूर पहनें और सुबह-शाम की सैर से बचें।
मौसम विभाग और वायु गुणवत्ता पूर्वानुमान सिस्टम के अनुसार, अगले कुछ दिनों में भी स्थिति ‘बहुत खराब’ से ‘गंभीर’ के बीच बनी रह सकती है। दिवाली के आसपास पटाखों और पराली जलाने से प्रदूषण और बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।
घर के अंदर रहें और एयर प्यूरीफायर का इस्तेमाल करें।
बाहर जाना जरूरी हो तो मास्क पहनें।
बच्चों और बुजुर्गों को घर के अंदर रखें।
पानी ज्यादा पिएं और पौष्टिक आहार लें।
दिल्ली में सर्दी के मौसम में हर साल प्रदूषण की समस्या दोहराई जाती है। प्रशासन पानी छिड़काव और अन्य उपाय कर रहा है, लेकिन आम नागरिकों को भी सावधानी बरतनी होगी। ताजा अपडेट के लिए CPCB या सरकारी ऐप्स की नियमित जांच करते रहें।
यह स्थिति तब बनी है जब पिछले वर्षों की तुलना में पराली जलाने की घटनाओं में कमी आई है। सरकार का दावा है कि धान की पराली के एक बड़े हिस्से का “एक्स-सीटू” प्रबंधन के जरिए इस्तेमाल किया गया है। पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश जैसे पड़ोसी राज्यों में पराली जलाने की घटनाओं में कमी के बारे में पूछे जाने पर कहा कि इस बार धान की लगभग 40 प्रतिशत पराली का इस्तेमाल एक्स-सीटू प्रबंधन के जरिए किया गया है।