

बाल आयोग में नियुक्ति की वैधता को लेकर गहराया विवाद।
फर्जी आदिवासी प्रमाण पत्र से बाल आयोग में सरकारी नौकरी।
सुकमा जिला बाल आयोग के सदस्य के रूप में कार्यरत थे कर्मचारी।
बर्खास्तगी के बाद भी सरकारी मानदेय और वेतन प्राप्त कर रहे हैं।
Sukma Expose Fake Caste Certificate: कोंटा क्षेत्र में कथित फर्जी आदिवासी जाति प्रमाण पत्र के आधार पर सरकारी नौकरी हासिल करने का मामला एक बार फिर चर्चा में है। वर्षों तक सरकारी पदों पर सेवाएं देने और वेतन का लाभ लेने के बाद कुछ कर्मचारियों की जाति संबंधी शिकायतें सही पाए जाने पर उन्हें सेवा से बर्खास्त किए जाने की बात सामने आई थी। अब इस पूरे प्रकरण में एक नया सवाल खड़ा हो रहा है कि जिन लोगों ने वर्षों तक सरकारी खजाने से वेतन प्राप्त किया, उनसे उस राशि की वसूली होगी या मामला केवल बर्खास्तगी तक ही सीमित रह जाएगा?
दरअसल, इस मामले को लेकर भाजपा नेताओं और सर्व आदिवासी समाज की ओर से पूर्व में शिकायतें उठाई गई थीं। उपलब्ध समाचार रिपोर्ट में कोंटा क्षेत्र के 32 कर्मचारियों के जाति प्रमाण पत्रों की जांच और प्रशासनिक कार्रवाई का उल्लेख है। मामला राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग तक पहुंचने की बात भी रिपोर्ट में कही गई है। ऐसे में यह प्रकरण केवल नौकरी से बर्खास्तगी का नहीं, बल्कि सरकारी नियुक्तियों में आरक्षण की पात्रता और प्रशासनिक जवाबदेही का भी सवाल बन गया है।
इस मामले में सबसे गंभीर सवाल दो ऐसे व्यक्तियों को लेकर उठाया जा रहा है, जिनके बारे में दावा है कि वे पहले फर्जी जाति प्रमाण पत्र के मामले में बर्खास्त किए गए शिक्षकों में शामिल थे, लेकिन वर्तमान में सुकमा जिला बाल आयोग के सदस्य के रूप में कार्यरत हैं और सरकारी मानदेय अथवा वेतन प्राप्त कर रहे हैं।
यदि यह दावा सही है तो कई सवालों के जवाब प्रशासन को देने होंगे। क्या संबंधित व्यक्तियों की नियुक्ति से पहले उनके सेवा संबंधी रिकॉर्ड और पात्रता का सत्यापन किया गया था? क्या बर्खास्तगी के आदेश की जानकारी नियुक्ति करने वाले विभाग को थी? यदि पहले की सेवा में जाति प्रमाण पत्र अमान्य पाया गया था तो नई नियुक्ति के लिए उनकी पात्रता किस आधार पर तय की गई?
फर्जी जाति प्रमाण पत्र के आधार पर नौकरी हासिल करने के मामलों में सेवा समाप्ति और आर्थिक लाभों की वसूली दो अलग-अलग कानूनी प्रश्न हैं। सुप्रीम कोर्ट ने 22 फरवरी 2022 को जयश्री बनाम डायरेक्टर ऑफ कॉलेजिएट एजुकेशन मामले में सेवा समाप्ति को बरकरार रखा, लेकिन उस विशेष मामले की परिस्थितियों में पहले से अर्जित वेतन की वसूली नहीं करने का निर्देश दिया।
वहीं छत्तीसगढ़ शासन ने अगस्त 2026 में भी फर्जी जाति प्रमाण पत्र के आधार पर नौकरी पाने वाले कर्मचारियों के मामलों में कार्रवाई तेज करने और जिनके प्रमाण पत्र उच्चस्तरीय छानबीन समिति द्वारा निरस्त किए जा चुके हैं तथा जिन्हें न्यायालय से स्थगन नहीं मिला है, उनकी सेवा समाप्ति की प्रक्रिया आगे बढ़ाने के निर्देश दिए थे।
कोंटा क्षेत्र के जिन कर्मचारियों के जाति प्रमाण पत्र अमान्य पाए गए, उनकी पूरी जांच और कार्रवाई की स्थिति क्या है?
बर्खास्त कर्मचारियों को अब तक कुल कितनी वेतन राशि का भुगतान हुआ?
क्या वेतन और अन्य आर्थिक लाभों की वसूली को लेकर कोई विभागीय निर्णय लिया गया है?
सुकमा जिला बाल आयोग के दो कथित सदस्यों की नियुक्ति किन नियमों और दस्तावेजों के आधार पर हुई?
क्या नियुक्ति से पहले उनके पुराने सेवा रिकॉर्ड और बर्खास्तगी संबंधी आदेशों का सत्यापन कराया गया था?
अब निगाहें जिला प्रशासन और छत्तीसगढ़ शासन पर हैं। जरूरत है कि पूरे प्रकरण की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच कराई जाए। बाल आयोग में नियुक्त बताए जा रहे दोनों व्यक्तियों की पात्रता, नियुक्ति प्रक्रिया और भुगतान की वैधता की भी जांच हो। यदि किसी स्तर पर नियमों का उल्लंघन या गलत जानकारी देकर लाभ लेने की पुष्टि होती है तो नियमानुसार कार्रवाई की जाए।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि फर्जी जाति प्रमाण पत्र के मामले में नौकरी गंवाने के बाद क्या सरकारी खजाने से वर्षों तक लिए गए वेतन और अन्य लाभों की जवाबदेही भी तय होगी, या फिर यह मामला बर्खास्तगी के आदेश तक ही सिमटकर रह जाएगा?