महाभारत के 18 पर्व जुबानी याद! फिर भी खैरागढ़ के पंडवानी कलाकार को डाला गया नवोदित कलाकार की सूची में

Pandwani Artist Devendra Verma: खैरागढ़ के ग्राम बघमर्रा निवासी देवेंद्र वर्मा का दावा है कि वे वर्ष 2007-08 से मंचों पर पंडवानी की प्रस्तुति दे रहे हैं, महाभारत के 18 पर्वों की कथा उन्हें कंठस्थ है।
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पंडवानी कलाकार देवेन्द्र वर्मा(सोर्स - नवभारत लाइव)
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Highlights

  • 18 साल की साधना के बाद भी ‘नवोदित’ का तमगा।

  • देवेंद्र को 18 पर्वों की कथा कंठस्थ।

  • युवा पंडवानी गायक की पीड़ा ने छेड़ दी नई बहस।

  • नई ग्रेडेशन सूची में देवेंद्र को मिला B ग्रेड।

Chhattisgarh Artists Gradation List: छत्तीसगढ़ संस्कृति विभाग के कलाकार ग्रेडेशन पर उठे सवालों के बीच अब एक युवा पंडवानी गायक की पीड़ा ने नई बहस छेड़ दी है। खैरागढ़-छुईखदान-गंडई जिले के ग्राम बघमर्रा निवासी देवेंद्र वर्मा का दावा है कि वे वर्ष 2007-08 से मंचों पर पंडवानी की प्रस्तुति दे रहे हैं, महाभारत के 18 पर्वों की कथा उन्हें कंठस्थ है और छत्तीसगढ़ सहित अन्य राज्यों में भी वे अपनी कला का प्रदर्शन कर चुके हैं। इसके बावजूद संस्कृति विभाग की नई ग्रेडेशन सूची में उन्हें B ग्रेड, यानी नवोदित कलाकारों की श्रेणी में रखा गया है।

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712 कलाकारों वाली सूची को लेकर सवाल

यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि संस्कृति विभाग की 712 कलाकारों वाली ग्रेडेशन सूची को लेकर पहले से सवाल उठ रहे हैं। विभागीय दस्तावेज में B श्रेणी को नवोदित कलाकारों से जोड़ा गया है, जबकि सूची में लंबे अनुभव वाले कई कलाकार भी इसी ग्रेड में दर्ज हैं।

देवेंद्र वर्मा का कहना है कि उन्होंने ग्रेडेशन के लिए आवश्यक दस्तावेज और अपनी उपलब्धियों के प्रमाण आवेदन के साथ जमा किए थे। उनका दावा है कि करीब 18-19 वर्षों से वे पंडवानी गायन कर रहे हैं और उनके पास राज्य के बाहर प्रस्तुतियों के प्रमाण भी उपलब्ध हैं। ऐसे में उनका सवाल है लगभग दो दशक से मंचीय प्रस्तुति देने वाले कलाकार को नवोदित किस आधार पर माना गया?

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देवेंद्र की सामने आई पीड़ा

देवेंद्र की पीड़ा केवल ग्रेड तक सीमित नहीं है। उनका आरोप है कि लोक संस्कृति को जीवंत रखने के लिए युवाओं को आगे आने का संदेश देने वाली सरकार और विभाग ने उन्हें अब तक कोई कार्यक्रम नहीं दिया। आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण लोककला को जीवित रखने की लड़ाई उनके लिए कठिन होती जा रही है।

देवेंद्र का एक और बड़ा दावा है कि वर्तमान में छत्तीसगढ़ में पुरुष कलाकारों के बीच कापालिक शैली में पंडवानी गायन करने वाले वे अकेले सक्रिय कलाकार हैं। इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि की जानी बाकी है, लेकिन यदि यह सही है तो विभागीय उपेक्षा और ग्रेडेशन का सवाल और गंभीर हो जाता है।

अब संस्कृति विभाग को स्पष्ट करना चाहिए कि कलाकारों के अनुभव, राष्ट्रीय एवं अंतरराज्यीय प्रस्तुतियों, प्रमाणपत्रों और कला में विशिष्ट योगदान का मूल्यांकन आखिर किस कसौटी पर किया गया? 18 साल की साधना के बाद भी ‘नवोदित’ का तमगा क्या यही छत्तीसगढ़ की लोक धरोहर बचाने की सरकारी नीति है?