

1400 साल पुराना है मां महामाया मंदिर का इतिहास।
पहली ज्योत छोटी कन्या से कराई जाती है प्रज्वलित।
छत्तीसगढ़ की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत।
माता के चमत्कारी स्वरूप और प्राचीन परंपराओं से जुड़ा है इतिहास।
Raipur Maa Mahamaya Temple Story: छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर की पुरानी बस्ती में स्थित माँ महामाया मंदिर… एक ऐसा सिद्धपीठ जिसका इतिहास करीब 1400 साल पुराना बताया जाता है। मान्यता है कि इस मंदिर का संबंध कल्चुरी राजाओं, माता के चमत्कारी स्वरूप और प्राचीन तांत्रिक परंपराओं से जुड़ा है। नवरात्रि के दौरान यहां हजारों श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं और मनोकामना ज्योति कलश प्रज्वलित कर माता से सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। लेकिन इस प्राचीन मंदिर का इतिहास क्या है? यहां की पहली ज्योत एक छोटी कन्या से क्यों प्रज्वलित कराई जाती है? और मंदिर की वास्तुकला में ऐसा क्या खास है? आइए जानते हैं माँ महामाया मंदिर से जुड़ी आस्था, इतिहास और परंपराओं की कहानी।
रायपुर की पुरानी बस्ती में स्थित माँ महामाया मंदिर… सिर्फ आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत का भी अहम हिस्सा है। इस मंदिर का इतिहास करीब 1400 साल पुराना बताया जाता है। इतिहासकारों के अनुसार मंदिर का निर्माण कल्चुरी वंश के राजा मोरध्वज ने कराया था।
कहा जाता है कि कल्चुरी राजाओं की परंपरा थी कि वे जब भी कोई नया किला बनवाते, तो सबसे पहले अपनी कुलदेवी माँ महामाया के मंदिर की स्थापना करते थे। मान्यता है कि राजा मोरध्वज को स्वप्न में माता ने दर्शन दिए थे। इसके बाद राजा अपनी सेना के साथ खारून नदी के तट पर पहुंचे, जहां एक विशाल शिला को तीन भयानक सांपों ने घेर रखा था। राजा की पूजा-अर्चना के बाद सांप वहां से हट गए। जब उस शिला को सीधा किया गया, तो सिंह पर सवार आठ भुजाओं वाली माँ महिषासुरमर्दिनी की प्रतिमा प्रकट हुई। इसी प्रतिमा को आज माँ महामाया के रूप में पूजा जाता है।
मंदिर की खासियत सिर्फ इसका इतिहास ही नहीं, बल्कि इससे जुड़ी तांत्रिक परंपराएं भी हैं। मान्यता है कि मंदिर का निर्माण तांत्रिक पद्धति के अनुसार किया गया है। मंदिर के गर्भगृह के गुंबद के भीतर प्राचीन श्री यंत्र की आकृति होने की बात कही जाती है, जिसे महालक्ष्मी का प्रतीक माना जाता है।
मंदिर की वास्तुकला भी श्रद्धालुओं और इतिहास में रुचि रखने वालों के लिए आकर्षण का केंद्र है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सूर्योदय के समय सूर्य की पहली किरणें गर्भगृह में विराजमान माँ समलेश्वरी के चरणों को स्पर्श करती हैं, जबकि सूर्यास्त के समय ढलते सूरज की अंतिम किरणें माँ महामाया के चरणों तक पहुंचती हैं। समय के साथ छत्तीसगढ़ में हैहयवंशी शासन का प्रभाव कम हुआ। इसके बाद 17वीं और 18वीं शताब्दी के दौरान नागपुर के मराठा शासकों द्वारा मंदिर के पुनर्निर्माण की बात कही जाती है। आज भी मंदिर की दीवारों और प्राचीन खंभों पर मराठा कालीन कला और भित्तिचित्रों की झलक देखने को मिलती है।
शारदीय और चैत्र नवरात्रि के दौरान मंदिर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है। इन दिनों मंदिर परिसर में हजारों मनोकामना ज्योति कलश प्रज्वलित किए जाते हैं। दावा किया जाता है कि नवरात्रि में यहां 10 हजार से अधिक ज्योति कलश जलाए जाते हैं। लेकिन इस मंदिर की एक परंपरा सबसे अलग है।
मान्यता है कि नवरात्रि की पहली ज्योत किसी वीआईपी या बड़े अधिकारी के बजाय 10 वर्ष से कम उम्र की एक कुंवारी कन्या के हाथों प्रज्वलित कराई जाती है। भक्त उस कन्या में माता का स्वरूप देखते हैं और इसे देवी के प्रति अपनी अटूट आस्था का प्रतीक मानते हैं।
श्रद्धालुओं का विश्वास है कि सच्चे मन से माँ महामाया के दरबार में मांगी गई मुराद पूरी होती है। यही आस्था प्राचीन इतिहास और पीढ़ियों से चली आ रही परंपराएं हैं जो करीब 1400 साल बाद भी रायपुर के इस मंदिर को छत्तीसगढ़ के प्रमुख धार्मिक स्थलों में शामिल रखती हैं।