जंगल से आईं 7 औषधियां, उनसे बने विशेष काढ़े से होगा मां दंतेश्वरी का अभिषेक

Maa Danteshwari Temple: दीपावली पर लक्ष्मी-नारायणी स्वरूप में होती है आराध्य देवी की पूजा, मशाल लेकर जंगल में जड़ी-बूटियां खोजने से लेकर औषधि स्नान तक निभाई जाती है सदियों पुरानी परंपरा
Maa Danteshwari Temple
बस्तर की आराध्य देवी मां दंतेश्वरी(सोर्स - नवभारत लाइव)
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Highlights

  • जंगलों से जुटाई गईं सात प्रकार की औषधियां।

  • सेवादार माता सरोवर से कांवड़ में जल लाकर करते है अर्पित।

  • दीपावली पर मां लक्ष्मी के रूप में होती है विशेष आराधना।

  • परंपरागत सेवादार अपनी-अपनी जिम्मेदारी निभाते हैं।

  • माता यहां नारायणी स्वरूप में है विराजित।

Maa Danteshwari Temple, Dantewada : बस्तर की आराध्य देवी मां दंतेश्वरी का दरबार केवल आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि सदियों पुरानी परंपराओं और अनूठे पूजा-विधानों का भी साक्षी है। यहां दीपावली पर होने वाली पूजा देश के दूसरे देवी मंदिरों से अलग पहचान रखती है।

इस दिन मां दंतेश्वरी को जंगलों से जुटाई गईं सात प्रकार की औषधियों से तैयार विशेष काढ़े से स्नान कराया जाता है। इतना ही नहीं, सालभर शक्ति स्वरूपा मां दुर्गा के रूप में पूजी जाने वाली देवी दीपावली पर धन और समृद्धि की देवी मां लक्ष्मी यानी नारायणी के स्वरूप में विराजती हैं।

मंदिर में इस विशेष अनुष्ठान को 'तुलसी पानी विधान' और 'औषधि स्नान संस्कार' के रूप में जाना जाता है। यह कोई एक दिन का आयोजन नहीं, बल्कि कई दिनों तक चलने वाली पूजा परंपरा है। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की सप्तमी से त्रयोदशी तक तुलसी पानी संस्कार होता है।

इस दौरान तड़के करीब तीन बजे सेवादार माता सरोवर से कांवड़ में जल लाकर देवी के गर्भगृह में अर्पित करते हैं। इसके बाद दीपावली पर विशेष औषधि स्नान के साथ इस पूजा विधान का समापन होता है।

मशालों की रोशनी में जंगलों तक पहुंचते हैं सेवादार

इस परंपरा का सबसे दिलचस्प हिस्सा दीपावली की पूर्व संध्या पर शुरू होता है। माता के औषधि स्नान के लिए जरूरी जड़ी-बूटियां जुटाने की जिम्मेदारी मंदिर के बारह लंकवार सेवादारों में शामिल कतियार परिवार को सौंपी गई है। इस रस्म में पंडाल और बोड़का परिवार के सदस्य भी सहयोग करते हैं।

शाम होते ही मंदिर में विशेष पूजा के बाद पारंपरिक वेशभूषा में सेवादार एकत्र होते हैं। इसके बाद मशालें लेकर जंगलों की ओर प्रस्थान किया जाता है। अंधेरे जंगलों और पहाड़ियों में औषधियों की तलाश कर उन्हें पारंपरिक विधि से एकत्र किया जाता है। पीढ़ियों से चली आ रही इस जिम्मेदारी को आज भी संबंधित परिवार पूरी श्रद्धा के साथ निभा रहे हैं।

गोपनीय रहती है, औषधियों की पहचान

माता के स्नान के लिए इस्तेमाल होने वाली जड़ी-बूटियों की पहचान और उन्हें जुटाने की प्रक्रिया इस परंपरा का सबसे रहस्यमय पहलू है। कुछ जानकारियों को कतियार परिवार के सदस्य अपनी पारंपरिक जिम्मेदारी और विरासत के रूप में गोपनीय रखते हैं।

मंदिर की इस परंपरा में औषधियों को सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करने की भी अनुमति नहीं होती। जंगल से लाई गई औषधियों को मंदिर के भोग कक्ष में विशेष विधि से तैयार किया जाता है।

आज रातभर इन्हें उबालकर इनका अर्क निकाला जायेगा,और दीपावली के दिन ब्रह्ममुहूर्त में इसी औषधीय जल से माता और मंदिर में स्थापित अन्य निर्धारित विग्रहों का स्नान कराया जायेगा। इस पूरे विधान में पुजारी जिया परिवार, कतियार और अन्य परंपरागत सेवादार अपनी-अपनी जिम्मेदारी निभाते हैं।

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दीपावली पर क्यों बदल जाता है माता का स्वरूप?

मां दंतेश्वरी मंदिर की एक और खास विशेषता यहां की नारायणी परंपरा है। मंदिर के पुजारी परिवार के अनुसार माता यहां नारायणी स्वरूप में विराजित हैं। इसी मान्यता से मंदिर के सामने गरुड़ स्तंभ भी स्थापित है। यही वजह है कि नवरात्र और अन्य अवसरों पर शक्ति स्वरूपा दुर्गा के रूप में पूजी जाने वाली माता की दीपावली पर मां लक्ष्मी के रूप में विशेष आराधना होती है।

मंदिर परिसर में भैरव और गजलक्ष्मी की एक ही शिलाखंड पर उकेरी गई दुर्लभ प्रतिमा भी इस अवसर पर विशेष आकर्षण रहती है। इस प्रतिमा के एक ओर भैरव और दूसरी ओर गजलक्ष्मी का अंकन है। दीपावली के पूजा विधान में इसका भी विशेष महत्व बताया जाता है।

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कुम्हार समाज के दीयों के बाद जगमगाता है मंदिर

इस अनुष्ठान में केवल मंदिर के पुजारी और सेवादार ही नहीं, बल्कि स्थानीय समाजों की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। कुम्हार समाज द्वारा तैयार किए गए मिट्टी के दीये, कलश और हांडी माता को अर्पित किए जाते हैं। स्थानीय मान्यता के अनुसार इन पारंपरिक मिट्टी के पात्रों को गर्भगृह में समर्पित करने के बाद ही मंदिर परिसर में दीप प्रज्ज्वलन की शुरुआत होती है।

इस तरह दीपावली का उत्सव स्थानीय कारीगरों और समाज की भागीदारी से भी जुड़ता है। औषधि स्नान, विशेष श्रृंगार, छप्पन भोग और महाआरती के साथ मंदिर में दीपोत्सव का उल्लास चरम पर पहुंचता है। मां दंतेश्वरी के लक्ष्मी स्वरूप के दर्शन के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं।

दरअसल, दंतेवाड़ा की यह परंपरा केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है। इसमें जंगलों से जुड़ा आदिवासी ज्ञान, पारिवारिक जिम्मेदारियों का पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरण, पारंपरिक वाद्ययंत्र, स्थानीय कारीगरों की भूमिका और सदियों पुरानी आस्था एक साथ दिखाई देती है। यही वजह है कि मां दंतेश्वरी मंदिर की दीपावली बस्तर की सांस्कृतिक विरासत का एक विशिष्ट अध्याय मानी जाती है।