

काछनगादी की सदियों पुरानी कथा में छिपा है जगदलपुर के नामकरण का रहस्य ।
आज भी दशहरा मनाने से पहले मांगी जाती है देवी से इजाजत।
रोमांच है और जगदलपुर के जन्म की कहानी।
कांटों के झूले पर झूलती काछन देवी ने दी थी राजधानी बसाने की अनुमति।
Chhattisgarh Bastar Dussehra 2026: बस्तर दशहरा सिर्फ रथ, रस्मों और देवी-देवताओं की पूजा का पर्व नहीं है। इसके पीछे सदियों पुरानी ऐसी जनश्रुतियां भी हैं, जिनमें रहस्य है, रोमांच है और जगदलपुर के जन्म की कहानी भी। इन्हीं में एक है काछनगादी की कथा, जिसमें एक ओर खरगोश से डरकर भागता शिकारी कुत्ता है, तो दूसरी ओर आगे बढ़ने से इनकार करती राजा की सेना। इस रहस्यमयी घटनाक्रम का अंत कांटों के झूले पर झूलती काछन देवी से अनुमति मिलने के साथ होता है।
जनश्रुतियों के अनुसार, जब महाराजा दलपत देव अपनी सेना के साथ जगतुगुड़ा पहुंचे, तब वहां उन्होंने कुम्हड़े का एक फूल देखा। कहा जाता है कि इसके बाद उनकी सेना के साथ हाथी-घोड़े तक मानो जड़ हो गए। किसी की भी आगे बढ़ने की हिम्मत नहीं हुई। इसी दौरान राजा ने एक और विचित्र दृश्य देखा। जिस शिकारी कुत्ते से खरगोश को डरना चाहिए था, वही कुत्ता खरगोश से डरकर भाग रहा था। प्रकृति के इस उलटफेर ने राजा की जिज्ञासा बढ़ा दी। आखिर इस धरती में ऐसा क्या रहस्य है, जहां खरगोश शिकारी कुत्ते पर भारी पड़ रहा है और विशाल सेना आगे बढ़ने में असमर्थ है? आज जगदलपुर का वह स्थान कुम्हड़ाकोट कहलाता है।
लोककथा के मुताबिक, उस समय जगतुगुड़ा पर जगतू माहरा का अधिकार था और पूरे क्षेत्र में उनकी कुलदेवी काछन देवी की मान्यता थी। जनश्रुति कहती है कि देवी की अनुमति के बिना कोई बाहरी व्यक्ति इस क्षेत्र में प्रवेश नहीं कर सकता था। राजा दलपत देव की सेना का आगे न बढ़ पाना भी इसी मान्यता से जोड़कर देखा जाता है। जब राजा को इस परंपरा और देवी की महिमा का पता चला, तो उन्होंने काछन देवी को प्रसन्न करने और इस क्षेत्र में प्रवेश की अनुमति पाने का मार्ग अपनाया।
काछनगादी की रस्म में पनका समाज की कुंआरी कन्या पर काछन देवी के आरूढ़ होने की मान्यता है। देवी को बेल के कांटों से बने विशेष झूले पर झुलाया जाता है। इसके बाद राजा देवी से क्षेत्र में प्रवेश और यहां अपनी राजधानी स्थापित करने की अनुमति मांगते हैं। लोककथा के अनुसार, जगतू माहरा ने भी राजा दलपत देव को जगतुगुड़ा अपनी राजधानी बनाने के लिए सौंप दिया। इसी कथा में जगतू माहरा और दलपत देव के नामों को जोड़कर जगतुगुड़ा का नाम जगदलपुर पड़ने की बात कही जाती है।
काछनगादी की यही कथा बस्तर दशहरा की परंपराओं को विशिष्ट पहचान देती है। मान्यता है कि दशहरा के प्रमुख आयोजनों से पहले काछन देवी की अनुमति ली जाती है। समय बदला, राजशाही समाप्त हुई और दशहरा का स्वरूप भी कई बदलावों से गुजरा, लेकिन देवी से अनुमति लेने की परंपरा आज भी निभाई जाती है।
आज संपन्न हुई काछनगादी रस्म इसी सांस्कृतिक विरासत की जीवंत कड़ी है। कांटों के झूले पर विराजमान देवी, आस्था में डूबे श्रद्धालु और सदियों पुरानी लोककथा,ये सब मिलकर याद दिलाते हैं कि बस्तर दशहरा केवल उत्सव नहीं, बल्कि बस्तर की ऐतिहासिक स्मृतियों, सामाजिक सहभागिता और लोकविश्वासों का अनूठा संगम है।