

SEBI New Experiment in Share Market: सरकार और पूंजी बाजार नियामक 'सेबी' का हर कदम निवेशकों के हित में होना चाहिए, लेकिन जिस तरह से हाल के वर्षों में निवेशक विरोधी कदम उठाए जा रहे हैं, उसे देखते हुए शायद यही लग रहा है कि सरकार और सेबी (SEBI) को निवेशकों के घाटे की चिंता ही नहीं है। STT, STCG, LTCG जैसे एक के बाद एक लगाए गए टैक्स बोझ से तो देश के करोड़ों निवेशक पहले से ही बेहाल हैं।
अब सेबी भी निवेशकों और कारोबारियों की कीमत पर भारतीय बाजार में नए-नए प्रयोग करने लगी है। सेबी ने 3 अगस्त 2026 से क्लोजिंग ऑक्शन सत्र (CAS) लागू किया है। इसका उद्देश्य शेयरों की अंतिम कीमत को पहले की व्यवस्था से बेहतर तरीके से तय करना और वास्तविक मांग व आपूर्ति के आधार पर सही कीमत सामने लाना है।
लेकिन इस नई व्यवस्था को लागू हुए अभी एक महीना भी पूरा नहीं हुआ है कि CAS से बाजार में उत्पन्न अप्रत्याशित उतार-चढ़ाव ने बाजार में गंभीर चिंता पैदा कर दी है। सवाल अब यह है कि सेबी की इस नई व्यवस्था का दुष्परिणाम कहीं बाजार के निवेशक और कारोबारी तो नहीं चुका रहे हैं?
CAS से शेयर बाजार में जिस तरह अंतिम कारोबारी समय में अप्रत्याशित उतार-चढ़ाव आ रहा है, उसे देख हर कोई हैरान और परेशान है। इसके दो बड़े उदाहरण हैं-
31 अगस्त: सेंसेक्स-निफ्टी गिरे, बैंक निफ्टी 600 अंक उछला
31 अगस्त के दिन निफ्टी करीब 0.39% और सेंसेक्स 0.40% गिरकर बंद हुए। यानी व्यापक बाजार का रुख कमजोर था। लेकिन दूसरी ओर बैंक निफ्टी 0.92% बढ़कर 58,025 अंक पर बंद हुआ और दिन के उच्चतम स्तर पर ही बंद हुआ। सबसे चौंकाने वाली बात क्लोजिंग के आखिरी कुछ मिनटों में हुई। लगभग 3.25 बजे बैंक निफ्टी इंडेक्स 57,400 अंक के आसपास था, लेकिन उसके बाद केवल 5 मिनट में ही यह उछलकर 58,025 अंक पर पहुंच गया।
यानी 5 मिनट में 625 अंकों का अप्रत्याशित उछाल। अब सवाल है कि जब सेंसेक्स और निफ्टी गिर रहे थे, तब बैंक निफ्टी क्लोजिंग के आखिरी पांच मिनट में 600 से ज्यादा अंक कैसे उछल गया? क्या यह सामान्य बाजार की खरीदारी थी? नहीं। स्पष्ट है यह नई क्लोजिंग ऑक्शन सिस्टम का साइड इफेक्ट है।
31 अगस्त को एक्सिस बैंक, एशियन पेंट्स और भारती एयरटेल जैसे बड़े शेयरों की कीमतों में भी क्लोजिंग के दौरान हुए भारी उतार-चढ़ाव ने सबको चौंका दिया। इन कंपनियों का महत्व इसलिए भी ज्यादा है क्योंकि निफ्टी-सेंसेक्स में इनका बड़ा वेटेज है।
किसी बड़े शेयर की अंतिम कीमत में अचानक बदलाव होने पर उसका असर केवल उस शेयर तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे इंडेक्स पर भी पड़ता है और उससे बाजार के लाखों कारोबारियों को भारी नफा-नुकसान भी होता है।
31 अगस्त से चार दिन पहले, 27 अगस्त को फ्यूचर और ऑप्शन सौदों की मासिक समाप्ति के दिन सेंसेक्स में क्लोजिंग नीलामी के दौरान करीब 2,000 अंकों का असामान्य उतार-चढ़ाव देखने को मिला। CAS के दौरान अंतिम 15 मिनट में सेंसेक्स करीब 2,000 अंक नीचे चला गया और फिर संभल गया। इस घटना ने कारोबारियों के बीच नई व्यवस्था को लेकर चिंता बढ़ा दी।
यह महज एक सामान्य उतार-चढ़ाव नहीं था क्योंकि जब कुछ ही मिनटों में सूचकांक में हजारों अंकों का उतार-चढ़ाव होता है, तो इसका असर छोटे निवेशक से लेकर बड़े संस्थागत कारोबारी तक, सभी पर पड़ता है। यह एक तरह से कैसिनो जैसी स्थिति है।
सीएएस में नियमित कारोबार दोपहर 3.15 बजे समाप्त होता है। इसके बाद क्लोजिंग कीमत तय करने के लिए नीलामी प्रक्रिया चलती है। यही वह समय है, जब छोटे निवेशकों और कारोबारियों की परेशानी बढ़ रही है। मान लीजिए किसी कारोबारी ने 3.15 बजे उपलब्ध कीमत को देखकर अपनी स्थिति संभाल ली, लेकिन उसके बाद CAS में शेयर या इंडेक्स की कीमत अचानक काफी ऊपर या नीचे चली गई।
ऐसी स्थिति में कारोबारी के पास सामान्य कारोबार की तरह लगातार खरीद-बिक्री करके अपना जोखिम कम करने का मौका नहीं होता है। इसका सीधा असर फ्यूचर और ऑप्शन सौदों पर पड़ता है और उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है।
इसलिए CAS की सफलता का पैमाना यह नहीं होना चाहिए कि क्लोजिंग कीमत कितनी जल्दी तय होती है। असली सवाल यह है कि उस कीमत को तय करने की 'कीमत' आखिर कौन चुका रहा है? जाहिर है, इस प्रयोग में सेबी अधिकारियों का तो कोई नुकसान होना नहीं है।
नुकसान तो देश के करोड़ों निवेशकों और कारोबारियों का ही हो रहा है। आश्चर्य इस बात का है कि CAS के इतने साइड इफेक्ट सामने आने के बाद भी सेबी अध्यक्ष इसे वापस नहीं ले रहे है। यह चिंताजनक स्थिति है।