
केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण, (सोर्स- सोशल मीडिया)
RBI MPC 2026: बजट के बाद अब आम आदमी समेत शेयर बाजार और अर्थशास्त्रियों की नजर 6 फरवरी 2026 को होने वाली भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति बैठक पर है। उससे पहले अधिकतर बड़े आर्थिक संस्थानों के अर्थशास्त्रियों की राय एक जैसी नजर आ रही है। नोमुरा, सिटी इंडिया, एसबीआई, जेपी मॉर्गन और देश के पूर्व मुख्य सांख्यिकीविद प्रोणब सेन समेत कई विशेषज्ञों का मानना है कि इस बार मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी (MPC) रेपो रेट में कोई बदलाव नहीं करेगी।
विशेषज्ञों का कहना है कि भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) फिलहाल महंगाई के रुझान, रुपये की चाल और वैश्विक हालात को और साफ तौर पर समझना चाहेगा, इसलिए “रुककर देखने” की रणनीति अपनाई जा सकती है।
अर्थशास्त्रियों के मुताबिक, आने वाले समय में रुपये पर दबाव, ग्लोबल मार्केट की अस्थिरता और विदेशी पूंजी के प्रवाह जैसे फैक्टर नीति फैसलों को प्रभावित करेंगे। दीपक चिनॉय ने कहा कि रुपये की कमजोरी अपने आप में समस्या नहीं है, बल्कि यह पूंजी प्रवाह की कमी का संकेत है। खासकर एफडीआई का स्तर इतना मजबूत नहीं है कि वह चालू खाते के घाटे को आसानी से फंड कर सके। उनका मानना है कि अगर वैश्विक उतार-चढ़ाव ज्यादा समय तक बना रहता है, तो आरबीआई को रुपये को “शॉक एब्जॉर्बर” की तरह काम करने देना चाहिए, बजाय इसके कि विदेशी मुद्रा भंडार का ज्यादा इस्तेमाल किया जाए।
सिटी इंडिया के समीरन चक्रवर्ती ने चेतावनी दी कि अगर रुपये में जरूरत से ज्यादा गिरावट आती है, तो इसका असर निवेशकों के व्यवहार पर पड़ सकता है। इससे विदेशी निवेश आने में देरी हो सकती है। उन्होंने कहा कि आज के समय में करेंसी को लेकर उम्मीदें निवेश फैसलों में बड़ी भूमिका निभा रही हैं। ऐसे में आरबीआई की ओर से रुपये के वैल्यूएशन को लेकर साफ संकेत या गाइडेंस मिलना निवेशकों के लिए काफी मददगार साबित हो सकता है।
वहीं, नोमुरा की सोनल वर्मा का कहना है कि नए उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) सीरीज़ को लेकर अनिश्चितता भी रेपो रेट में फिलहाल बदलाव न करने की बड़ी वजह है। उनके अनुसार, नई सीरीज़ में खाने-पीने और सेवाओं के वेटेज बदलने से महंगाई करीब 50 बेसिस प्वाइंट ज्यादा दिख सकती है। इस ट्रांजिशन के दौरान MPC को महंगाई की दिशा और उसकी गति पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए।
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एसबीआई के सौम्य कांति घोष ने बॉन्ड यील्ड और लिक्विडिटी ट्रांसमिशन को अहम मुद्दा बताया, जबकि प्रोणब सेन ने कहा कि असली सवाल यह है कि क्या भारतीय अर्थव्यवस्था में निवेशकों का भरोसा फिर से मजबूत हो पा रहा है या नहीं।






