

OPEC+ Production Cut: अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की सप्लाई और कीमतों को लेकर ओपेक प्लस एक बार फिर बड़ा कदम उठाने जा रहा है। समूह की रविवार को होने वाली महत्वपूर्ण बैठक से पहले जो संकेत सामने आए हैं, उनके मुताबिक ओपेक प्लस नवंबर महीने के लिए अपने तेल उत्पादन लक्ष्य में कोई बदलाव नहीं करेगा।
इसका सीधा मतलब यह है कि सदस्य देशों के लिए तेल उत्पादन का कोटा पहले की तरह ही बरकरार रहेगा। इस स्थिति के पीछे मुख्य वजह पश्चिम एशिया में चल रहा भू-राजनीतिक तनाव है।
ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच जारी संघर्ष का सीधा असर खाड़ी देशों के ओपेक प्लस उत्पादकों पर भी साफ तौर पर देखा जा रहा है। मौजूदा हालात के कारण ये देश अपनी तय क्षमता के मुकाबले काफी कम मात्रा में तेल निकाल पा रहे हैं। पिछले कुछ महीनों के आंकड़ों पर नजर डालें तो इन देशों से होने वाला तेल का निर्यात सामान्य दिनों की तुलना में लुढ़ककर 60 से 80 प्रतिशत के बीच ही सिमट गया है।
इस क्षेत्रीय संघर्ष और अनिश्चितता का दूरगामी प्रभाव आगामी वर्ष 2027 के लिए तय होने वाले उत्पादन कोटे पर भी पड़ा है। फिलहाल इस कोटे की समीक्षा के काम को रोक दिया गया है, क्योंकि मौजूदा तनावपूर्ण माहौल में भविष्य की तेल सप्लाई और उत्पादन का सटीक आकलन करना बेहद कठिन हो गया है।
हालांकि, ओपेक प्लस ने साल 2026 के दौरान अपनी पुरानी उत्पादन कटौती से धीरे-धीरे बाहर निकलते हुए तेल का उत्पादन बढ़ाने के प्रयास जरूर किए थे, लेकिन मध्य पूर्व के लगातार गहराते तनाव ने इन सभी योजनाओं को जमीन पर उतारने नहीं दिया।
ओपेक के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, समूह के सात प्रमुख देशों- सऊदी अरब, रूस, इराक, कुवैत, अल्जीरिया, कजाखस्तान और ओमान ने मिलकर अगस्त महीने में रोजाना 2.5 करोड़ बैरल कच्चे तेल का उत्पादन किया।
यह आंकड़ा जुलाई के मुकाबले करीब 6.3 लाख बैरल प्रतिदिन जरूर ज्यादा था, लेकिन इस मामूली सुधार के बावजूद फरवरी में युद्ध की शुरुआत होने से पहले के उत्पादन स्तर से तुलना करें, तो यह अब भी करीब 50 लाख बैरल प्रतिदिन कम बना हुआ है।
मौजूदा समय की बात करें तो ओपेक प्लस के अधिकांश सदस्य देशों पर रोजाना लगभग 20 लाख बैरल की उत्पादन कटौती का नियम लागू है। ऐसे में उत्पादन बढ़ाने के तरीकों पर किसी भी प्रकार का नया फैसला लेने से पहले समूह को अपनी मौजूदा उत्पादन क्षमता की गहन समीक्षा करनी होगी।
अंदरूनी सूत्रों के हवाले से मिल रही जानकारी के अनुसार, वर्ष 2027 से पहले ओपेक प्लस के उत्पादन ढांचे में किसी भी बड़े बदलाव की संभावना बेहद कम है।