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Explainer: आजादी से अब तक…कैसे ₹3 से ₹95 तक पहुंचा डॉलर का सफर, जानें कब-कब और क्यों गिरा हमारा रुपया?
Indian Rupee vs Dollar: रुपये को मजबूती देने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक अब तक अरबों डॉलर खर्च कर चुका है। अगर ऐसे कदम नहीं उठाए जाते तो स्थिति और भी बेहद खराब हो सकती थी।
- Written By: मनोज आर्या

डॉलर vs रुपया, (कॉन्सेप्ट फोटो- AI)
Indian Rupee Journey From Independence: अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये में जारी गिरावट थमता नजर नहीं आ रहा है। गुरुवार, (14 मई) की सुबह जब करेंसी बाजार खुला तो रुपये में भारी गिरावट देखी गई। इस दौरान रुपया 20 पैसे टूटकर अपने ऑल टाइम लो के लेवल पर आ गया। जिसकी वजह से रुपया एशिया की सबसे कमजोर करेंसी बन गई है। रुपये को मजबूती देने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक अब तक अरबों डॉलर खर्च कर चुका है। अगर ऐसे कदम नहीं उठाए जाते तो स्थिति और भी बेहद खराब हो सकती थी।
इंटरबैंक फॉरेन एक्सचेंज मार्केट में रुपया 95.74 से टूटकर 95.76 पर आता दिखा, जो कि सीधे 20 पैसे की कमजोरी को दर्शाता है। इसके एक दिन पहले यानी 13 मई को भी रुपया 95.80 पर पहुंचने के बाद 95.66 प्रति डॉलर पर आकर ठहरा।
क्यों गिर रहा भारतीय रुपया?
अपनी जरूरत का लगभग 90 फीसदी कच्चा तेल और 50 प्रतिशत गैस भारत अन्य देशों से आयात करता है। मीडिल ईस्ट में पिछले कुछ महीनों से जारी तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतों में जोरदार उछाल देखी जा रही है। इससे भारत के मैक्रोइकॉनॉमिक आउटलुक पर दबाव बढ़ा है। ग्रोथ कम हुई है और महंगाई बढ़ी है। इस स्थिति में भारतीय करेंसी पर दबाव बढ़ना लाजमी है। इस पूरे हफ्ते का चार्ट देखें तो डॉलर रुपये के मुकाबले एक हफ्ते में 1.4% की गिरावट पर है। वहीं, पिछले तीन दिनों में तो ये सबसे निचले स्तर पर रहा।
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कितना कमजोर हुआ हमारा रुपया?
बता दें कि 15 अगस्त 1947 को जब भारत आजाद हुआ था, तब 1 अमेरिकी डॉलर की कीमत लगभग 3.30 रुपये से 4.16 रुपये के आसपास थी। 1947 से मई 2026 तक भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर होकर 90-95 रुपये के लेवल पर पहुंच गया, जो कि 75 साल में 90-95 प्रतिशत की गिरावट को दर्शाता है।
रुपये की गिरावट का ऐतिहासिक सफर
साल 1947-1966: देश की आजादी के शुरुआती दौर में 1 डॉलर का वैल्यू 4.76 रुपये के आसपास रही थी। आजादी के वक्त देश पर किसी भी तरह की कोई बाहरी कर्ज नहीं था। हालांकि, अलग-अलग विकास कार्यों और पंचवर्षीय योजनाओं के लिए फंड की जरूरतों ने भारत को कर्ज लेने पर मजबूर कर दिया। इसके पीछे का कारण 1962 भारत-चीन युद्ध और 1965 का भारत-पाक युद्ध था। इन इन युद्धों ने इकोनॉमी पर भारी बोझ डाला और विदेशी मुद्रा भंडार में कमी आई।
रुपये की गिरावट का ऐतिहासिक सफर
साल 1966: इस समय के दौरान भारतीय रुपये टूटकर 7.50 रुपये प्रति डॉलर तक पहुंच गया। इसी साल में इंदिरा गांधी सरकार ने भारतीय रुपये को डिवैलुएट किया था। इसके पीछे सूखे के कारण खाने की अनाज की की और युद्ध के बाद बढ़ती महंगाई थी। एक्सपोर्ट बढ़ाने और विदेशी निवेशकों को आकर्षित करने के लिए रुपये की कीमत घटानी पड़ी।
साल 1991: इस अवधी के दौरान भारतीय रुपये 17.90 से 24.50 रुपये प्रति डॉलर के आसपास पहुंच चुका था। यह देश की आर्थिक इतिहास का सबसे बुरा और अहम मोड़ था। यह वह समय था जब भारत के वास सिर्फ 15 दिनों के इंपोर्ट के लिए विदेशी करेंसी बची थी। इस स्थिति का मुख्य वजह खाड़ी युद्ध के कारण तेल की कीमतों में उछाल और भुगतान संतुलन (BoP) का संकट। सरकार को सोना गिरवी रखना पड़ा और मनमोहन सिंह ने रुपये का लगभग 18 से 20% तक डिवैलुएट किया ताकि इकोनॉमी को खोला जा सके।
साल 2000 से 2010: इस एक दशक में रुपया 44 से 46 प्रति डॉलर के आसपास रहा, जिसे सबसे स्थिर माना जाता है। इसे इंडियन इकोनॉमी को रफ्तार देना वाले दशक के रूप में देखा जाता है। सूचना प्रौद्योगिकी (IT) सेक्टर में तेज विकास हुआ और विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ने लगा। इस अवधी के दौरान भारतीय करेंसी काफी हद तक स्थिर रहा, लेकिन 2008 की वैश्विक मंदी के दौरान इसमें हल्की कमजोरी आई थी।
साल 2000 से 2010 तक डॉलर के मुकाबले स्थिर रहा भारतीय रुपया।
साल 2013: इस समय भारतीय करेंसी 68 रुपये प्रति डॉलर के आसपास पहुंच गया था। अगस्त 2013 में भारतीय करेंसी अचानक ऑल टाइम लो पर पहुंच गया था। इसके पीछे का कारण अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा राहत पैकेज को वापस लेने के संकेत। इस खबर के बाद से निवेशकों ने इंडियन मार्केट से पैसा निकालना शुरू कर दिया था।
साल 2018 से 2022: इस समय के दौरान अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया 70 से 80 तक का आंकड़ा छू लिया था। इस दौरान भारतीय करेंसी पर लगातार दवाब बढ़ हा था। इसके पीछे महंगा क्रूड ऑयल, व्यापार युद्ध और फिर कोरोना महामारी जैसे मुख्य कारण थे। इसके बाद 2022 में रूस-यूक्रेन वॉर से आपूर्ति श्रंखला पूरी तरह से प्रभावित हो गईं और अमेरिकी डॉलर मजबूत होता गया।
साल 2024 से 2026: अगर मौजूदा समय की बात करें तो फिलहाल 1 अमेरिकी डॉलर 95 रुपये का आंकड़ा पार कर चुका है। आज 14 मई को यह ₹95 के लेवल को पार कर कारोबार कर रहा है। इसके पीछे अमेरिका में ब्याज दरों का हाई लेवल, ग्लोबल तनाव क्रूड ऑयल की इंपोर्ट पर निर्भरता। हालांकि, RBI अपने विदेशी मुद्रा भंडार का उपयोग करके इस गिरावट को नियंत्रित करने की कोशिश करता रहता है।
14 मई 2026 को ऑल टाइम हाई पर भारतीय करेंसी।
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क्या रुपये में गिरावट कमजोरी के संकेत?
अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये का लगातार गिरना केवल कमजोरी का संकेत नहीं, बल्कि यह बदलती वैश्विक परिस्थितियों और भारत की उर्जा जरूरत का प्रमाण है। साल 1947 का ₹3.30 आज ₹95 इसलिए है क्योंकि भारत एक बंद अर्थव्यवस्था से निकलकर अब दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति बनने की राह पर है। वैश्विक अनिश्चितता और कई उतार-चढ़ाव के बावजूद भी इंडियन इकोनॉमी लगातार मजबूती से आगे बढ़ रही है।
Independence till now how us dollar reached 3 to 95 against indian rupee explainer
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