इजरायल-ईरान युद्ध का दलाल स्ट्रीट पर असर, एक हफ्ते में ₹21,000 करोड़ निकाले विदेशी निवेशक

Share Market: फरवरी से पहले लगातार तीन महीनों तक विदेशी निवेशक विक्रेता थे, जिन्होंने जनवरी में 35,962 करोड़ रुपये, दिसंबर में 22,611 करोड़ रुपये और नवंबर में 3,765 करोड़ रुपये की बिकवाली की।
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शेयर मार्केट, (सोर्स- सोशल मीडिया)
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FPI Outflow In March 2026: इजरायल-ईरान युद्ध के बीच बीते हफ्ते विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) ने भारतीय शेयर बाजार से 21,831 करोड़ रुपए की निकासी की है। यह जानकारी एक्सचेंज की ओर से जारी किए जाने वाले डेटा में दी गई। युद्ध के साथ ही विदेशी निवेशकों के रुख में बड़ा बदलाव आया है। इससे पहले फरवरी में एफपीआई ने 22,615 करोड़ रुपए का निवेश किया था, जो कि बीते 17 महीनों में अब तक का सबसे बड़ा विदेशी इनफ्लो था।

फरवरी से पहले लगातार तीन महीनों तक विदेशी निवेशकों ने शुद्ध विक्रेता थे, जिन्होंने जनवरी में 35,962 करोड़ रुपए, दिसंबर में 22,611 करोड़ रुपए और नवंबर में 3,765 करोड़ रुपए की बिकवाली की थी।

DIIs ने मार्केट को दिया सपोर्ट

हालांकि, घरेलू संस्थागत निवेशकों (डीआईआई) ने मार्च में भी समर्थन जारी रखा और स्थिर एसआईपी प्रवाह और दीर्घकालिक घरेलू भागीदारी के बल पर लगभग 32,786 करोड़ रुपए का निवेश किया। बाजार के जानकारों का मानना ​​है कि मार्च में हुई बिकवाली का कारण अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर हमले के बाद बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव थे। विश्लेषकों का कहना है कि इससे होर्मुज जलडमरूमध्य से आपूर्ति बाधित होने की आशंका बढ़ गई और ब्रेंट क्रूड की कीमत 90 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गई।

कच्चे तेल की कीमतों ने बिगाड़ा खेल

पिछले सप्ताह कतर के ऊर्जा मंत्री साद अल-काबी ने चेतावनी दी थी कि मध्य पूर्व में युद्ध कुछ दिनों तक जारी रहने पर खाड़ी देशों के निर्यातक देश आपातकालीन स्थिति घोषित कर आपूर्ति रोक सकते हैं, जिससे तेल की कीमत 150 डॉलर प्रति बैरल और प्राकृतिक गैस की कीमत 40 डॉलर प्रति एमएमबीटीयू तक पहुंच सकती है।

विश्लेषकों ने रुपए की कमजोरी और 92 डॉलर प्रति डॉलर के स्तर से नीचे गिरने के साथ-साथ अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में वृद्धि का भी हवाला दिया, जिससे पूंजी सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर आकर्षित हुई।

कब तक लौटेंगे विदेशी निवेशक?

तेल की ऊंची कीमतों से मुद्रास्फीति, चालू खाता घाटा और मुद्रा स्थिरता के जोखिम बढ़ जाते हैं, जिसका उभरते बाजारों के प्रति विदेशी निवेशकों के दृष्टिकोण पर प्रभाव पड़ेगा। विश्लेषकों का कहना है कि भू-राजनीतिक स्थिति स्पष्ट होने तक विदेशी निवेशकों के शुद्ध खरीदार के रूप में लौटने की संभावना नहीं है।

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