आम आदमी की सेहत से भी जुड़ा है बजट 2026 (सोर्स- सोशल मीडिया)
Healthcare Budget India: केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण आज देश का आम बजट पेश कर रही हैं। आमतौर पर लोग बजट में सिर्फ इनकम टैक्स, महंगाई और सैलरी पर ध्यान देते हैं, लेकिन बजट का असर हमारी सेहत पर भी सीधे पड़ता है। यह तय करता है कि अस्पताल कैसे काम करेंगे, दवाएं सस्ती होंगी या महंगी, और बीमारी के समय आम आदमी को कितनी आर्थिक मदद मिलेगी। इसलिए यह समझना जरूरी है कि बजट हमारे और हमारे परिवार की सेहत को कैसे प्रभावित करता है।
स्वास्थ्य मंत्रालय को बजट में मिलने वाला फंड तय करता है कि सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की संख्या बढ़ेगी या नहीं, नई मशीनें आएंगी या नहीं, और स्वास्थ्य सेवाएं गांव-देहात तक पहुंचेंगी या नहीं। बजट बढ़ने से प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, जिला अस्पताल और मेडिकल कॉलेज मजबूत होते हैं, जिससे आम आदमी को सस्ता और बेहतर इलाज मिलता है। बजट में कटौती का असर सीधे इलाज की गुणवत्ता और उपलब्धता पर पड़ता है।
बजट के जरिए यह तय होता है कि आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं का दायरा बढ़ेगा या नहीं। इन योजनाओं से करोड़ों गरीब और मध्यम वर्गीय परिवार मुफ्त इलाज की सुविधा पा सकते हैं। बजट बढ़ने से बीमारियों का कवरेज बढ़ता है और निजी अस्पतालों में इलाज की पहुंच आसान होती है, जिससे जेब पर बोझ कम होता है।
बजट में दवाओं, मेडिकल उपकरणों और हेल्थ टेक्नोलॉजी पर टैक्स या जीएसटी को लेकर फैसले किए जाते हैं। टैक्स घटाने से दवाएं और इलाज सस्ते हो सकते हैं। साथ ही, घरेलू फार्मा और मेडिकल डिवाइस उद्योग को बढ़ावा मिलने से देश में सस्ता और गुणवत्तापूर्ण इलाज उपलब्ध होने की संभावना बढ़ती है।
सेहत सिर्फ अस्पतालों से नहीं, बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी से भी जुड़ी है। बजट में पोषण योजनाओं, मिड-डे मील, आंगनवाड़ी, स्वच्छ भारत मिशन और जल जीवन मिशन के लिए प्रावधान तय करता है कि बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों का स्वास्थ्य कितना मजबूत रहेगा। कुपोषण, गंदा पानी और खराब स्वच्छता कई बीमारियों की जड़ हैं, और बजट इन्हें रोकने में अहम भूमिका निभाता है।
तनाव, डिप्रेशन, डायबिटीज और हार्ट डिजीज जैसी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। बजट में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं, काउंसलिंग, डिजिटल हेल्थ प्लेटफॉर्म और रोकथाम से जुड़े कार्यक्रमों के लिए फंड बढ़ाने से इन बीमारियों का समय रहते इलाज संभव होता है। यह तय करता है कि मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता मिले या नहीं।
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बजट के जरिए नए मेडिकल कॉलेज, नर्सिंग संस्थान और ट्रेनिंग प्रोग्राम शुरू किए जाते हैं। इससे डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों की कमी दूर होती है। ज्यादा प्रशिक्षित डॉक्टर होने से इलाज तक पहुंच आसान होती है और मरीजों को लंबा इंतजार नहीं करना पड़ता।