किशनगंज विधानसभा: 58 साल से इस सीट पर नहीं जीता कोई हिंदू उम्मीदवार, रिकॉर्ड टूटेगा या रहेगा बरकरार?

Bihar Assembly Elections: बिहार के चुनावी दंगल में सीमांचल की जिस सीट को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा होती है, वो है मुस्लिम बहुल किशनगंज। इस सीट पर एक बार फिर रोमांचक मुकाबला होने वाला है।
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किशनगंज विधानसभा (डिजाइन फोटो)
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Kishanganj Assembly Constituency: बिहार के चुनावी दंगल में सीमांचल की जिस सीट को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा होती है, वो है मुस्लिम बहुल किशनगंज। इस सीट पर एक बार फिर रोमांचक मुकाबला होने वाला है। एक ओर जहां कांग्रेस सीट पर अपनी पारंपरिक पकड़ को बरकरार रखने की कोशिश करेगी, वहीं बीजेपी और एआईएमआईएम यह तिलिस्म तोड़ने का प्रयास करेगी।

किशनगंज न सिर्फ एक विधानसभा सीट है, बल्कि यह सीमांचल क्षेत्र की राजनीतिक धुरी भी है। इसका इतिहास खगड़ा नवाब मोहम्मद फकीरुद्दीन के दौर से जुड़ा है। एक हिंदू संत के विरोध के बाद 'आलमगंज' नाम बदलकर ‘कृष्णा-कुंज’ रखा गया, जो आगे चलकर 'किशनगंज' कहलाया। किशनगंज 14 जनवरी 1990 को पूर्णिया से अलग होकर जिला बना, जो आज 1,884 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है।

किशनगंज के भौगोलिक स्थिति

यह जिला पूर्वी हिमालय की तलहटी में स्थित है, जहां महानंदा, मेची और कंकई जैसी नदियां बहती हैं। नेपाल और बंगाल की सीमाओं से सटे इस इलाके को पूर्वोत्तर भारत का प्रवेश द्वार भी कहा जाता है। किशनगंज बिहार का एकमात्र ऐसा इलाका है जहां वाणिज्यिक स्तर पर चाय की खेती होती है।

मुस्लिम वोटर्स की अहम भूमिका

किशनगंज की आबादी 2011 की जनगणना के अनुसार 16,90,948 थी, जिसमें मुस्लिम बहुलता है। यहां मुस्लिम वोट निर्णायक भूमिका निभाते हैं। 19 में से 17 बार मुस्लिम उम्मीदवार यहां से विजयी रहे हैं। यहां तक कि 1967 में सुशीला कपूर के बाद कोई हिंदू उम्मीदवार जीत दर्ज नहीं कर पाया। 57.04 फीसदी की साक्षरता दर और लगभग 897 लोगों की प्रति वर्ग किमी जनसंख्या घनत्व के साथ यह क्षेत्र बिहार की सामाजिक-सांस्कृतिक विविधता का प्रतिनिधित्व करता है। रेल और सड़क नेटवर्क के लिहाज से किशनगंज एक प्रमुख केंद्र है। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, पटना और गुवाहाटी जैसे बड़े शहरों से सीधा रेल संपर्क है। एनएच 31 किशनगंज को बिहार और पूर्वोत्तर भारत से जोड़ता है। गरीब नवाज एक्सप्रेस, जो यहीं से शुरू होती है, इसकी रेल पहचान को और मजबूत बनाता है।

किशनगंज का चुनावी इतिहास

किशनगंज विधानसभा सीट पर अब तक 19 चुनाव हुए हैं। इनमें से कांग्रेस ने 10 बार जीत हासिल की है, जबकि राजद ने 3 बार। अन्य दलों – जैसे प्रजा सोशलिस्ट पार्टी, जनता दल, लोकदल और एआईएमआईएम को एक-एक बार जीत मिली है। बीजेपी अब तक इस सीट पर जीत दर्ज नहीं कर पाई है, हालांकि कई बार बेहद नजदीकी मुकाबले में वह जरूर रही है। 2010 में स्वीटी सिंह सिर्फ 264 वोटों से और 2020 में 1,381 वोटों से यहां से पराजित हुईं।

2020 में कांग्रेस के इजहारुल हुसैन ने यह सीट जीती, जबकि एआईएमआईएम की बढ़ती पकड़ से मुस्लिम वोटों में बंटवारा देखा गया, जिसने मुकाबले को त्रिकोणीय बना दिया। यदि 2025 में भी एआईएमआईएम मुस्लिम वोटों में सेंध लगा पाती है और हिंदू वोट एकजुट रहते हैं, तो बीजेपी पहली बार यहां जीत का स्वाद चख सकती है।

(एजेंसी इनपुट के साथ)

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