कटोरिया विधानसभा: आरक्षण के बाद बदला सियासी समीकरण, भाजपा के सामने सीट बचाने की चुनौती
Bihar Assembly Elections: कटोरिया सीट में 2008 में एसटी के लिए आरक्षित होने से पहले यहां कांग्रेस का दबदबा था, जिसने 5 बार जीत दर्ज की थी। अब राजद-बीजेपी के बीच सीधा मुकाबला है।
- Written By: मनोज आर्या
बिहार विधानसभा चुनाव 2025, (कॉन्सेप्ट फोटो)
Katoria Assembly Constituency: बांका जिले की कटोरिया विधानसभा सीट (अनुसूचित जनजाति आरक्षित) इस बार चुनावी दृष्टि से विशेष महत्व रखती है। झारखंड की सीमा से सटे पहाड़ी क्षेत्र और छोटानागपुर पठार का हिस्सा होने के कारण यह सीट अपनी भौगोलिक और सांस्कृतिक विशिष्टता के लिए जानी जाती है। 2008 में आरक्षित होने के बाद यहां का चुनावी परिदृश्य पूरी तरह से बदल गया, और अब यह सीट भाजपा और राजद के बीच कड़े मुकाबले का केंद्र बन चुकी है।
आरक्षण के बाद भाजपा-राजद की सीधी टक्कर
कटोरिया सीट का इतिहास बताता है कि 2008 में एसटी के लिए आरक्षित होने से पहले यहां कांग्रेस का दबदबा था, जिसने 5 बार जीत दर्ज की थी। आरक्षण के बाद मुकाबला सीधे तौर पर राष्ट्रीय दलों के बीच आ गया, जहां भाजपा और राजद ने अपनी पकड़ मजबूत की है। पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा की निक्की हेम्ब्रम ने राजद की स्वीटी सीमा हेम्ब्रम को हराकर जीत हासिल की थी। यह हार-जीत का सिलसिला 2025 में भी जारी रहने वाला है।
स्वीटी सीमा हेम्ब्रम पर आरजेडी का भरोसा
इस बार भाजपा ने पूरन लाल टुडू को उम्मीदवार बनाया है, जबकि राजद ने पिछली बार की मजबूत दावेदार स्वीटी सीमा हेम्ब्रम को फिर से मैदान में उतारा है। इसके अलावा, प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी ने सलोनी मुर्मू को टिकट देकर चुनावी लड़ाई को त्रिकोणीय बना दिया है। चूंकि सभी प्रमुख उम्मीदवार अनुसूचित जनजाति (ST) से आते हैं, इसलिए गैर-आदिवासी वोटों (जैसे मुस्लिम, भूमिहार, कोइरी) की दिशा इस बार निर्णायक साबित हो सकती है।
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कटोरिया सीट का जातीय समीकरण
कटोरिया एसटी आरक्षित सीट होने के बावजूद, यहां के चुनावी नतीजे में गैर-आदिवासी समुदायों का वोट विभाजन महत्वपूर्ण है। मुस्लिम और सवर्ण वोटर हार-जीत में काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इस विधानसभा क्षेत्र के मुस्लिम मतदाताओं का पारंपरिक झुकाव महागठबंधन की ओर रहा है।
इसके अलावा, भूमिहार, ब्राह्मण, कोइरी और रविदास समुदाय के मतदाता भी अच्छी संख्या में हैं, जिनका रुझान एनडीए गठबंधन के पक्ष में होने की संभावना है। चूंकि आदिवासी वोट कई उम्मीदवारों के बीच बंट सकता है, इसलिए गैर-आदिवासी वोटों को एकजुट करने वाली पार्टी को बढ़त मिल सकती है।
इतिहास, धर्म और आस्था का केंद्र
कटोरिया क्षेत्र अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान के लिए जाना जाता है। बौंसी में स्थित मधुसूदन मंदिर श्रद्धालुओं के लिए एक प्रमुख केंद्र है। वहीं, राधानगर बाजार स्थित प्राचीन दुर्गा मंदिर में पिछले 136 वर्षों से मां भगवती को डाक चढ़ाने की परंपरा आज भी जारी है। चांदन नदी पर स्थित लक्ष्मीपुर गांव का उल्लेख राजा लक्ष्मीपुर की पूर्व सीट के रूप में किया जाता है, जिनके किले के अवशेष आज भी मौजूद हैं।
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कटोरिया की भौगोलिक स्थिति
यह क्षेत्र जिला मुख्यालय बांका से लगभग 25 किलोमीटर दूर और प्रसिद्ध बाबा बैद्यनाथ की नगरी देवघर से 40 किलोमीटर दूर है। कटोरिया का चुनावी परिणाम यह तय करेगा कि क्या भाजपा आरक्षित सीट पर अपना कब्जा बरकरार रखती है या राजद यहां वापसी करने में सफल होती है, खासकर तब जब मुस्लिम और सवर्ण वोटों के समीकरण निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।
