क्या Electric Vehicles हैं पर्यावरण के लिए सही? नई रिसर्च ने खोले कई राज़

पूरी दुनिया में इलेक्ट्रिक वाहनों तेजी से बढ़ रही है, वहीं कुछ रिसर्च ने इस पूरे कॉन्सेप्ट पर सवाल खड़े कर दिए हैं। जिसमें कहा जा रहा है रि ईवी गाड़ियां पेट्रोल और डीजल से ज्यादा प्रदूषण करती है।
क्या Electric Vehicles हैं पर्यावरण के लिए सही? नई रिसर्च ने खोले कई राज़
रिसर्ज में क्या कहा गया है EV के बारे में। (सौ. Freepik)
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जहां पूरी दुनिया इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) की ओर तेजी से बढ़ रही है, वहीं हाल ही में आई कुछ रिसर्च ने इस पूरे कॉन्सेप्ट पर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब तक माना जाता रहा है कि ईवी गाड़ियां पेट्रोल और डीजल गाड़ियों की तुलना में कम प्रदूषण करती हैं और पर्यावरण के लिए सुरक्षित हैं। लेकिन ताजा रिपोर्ट्स बता रही हैं कि ईवी वाहनों का कुल कार्बन उत्सर्जन पारंपरिक वाहनों से कहीं अधिक हो सकता है।

ईवी गाड़ियों का बढ़ता कार्बन फुटप्रिंट

एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, एक इलेक्ट्रिक कार के निर्माण से 5 से 10 टन CO₂ तक का उत्सर्जन होता है, जबकि पारंपरिक इंजन वाली गाड़ियों का कुल एमिशन इससे कहीं कम होता है। चौंकाने वाली बात यह है कि जहां सामान्य गाड़ियों का एमिशन 26% होता है, वहीं इलेक्ट्रिक वाहनों में यह 46 गुना तक ज्यादा हो सकता है।

EVs के भारी वजन से बढ़ रहा है प्रदूषण

Emission Analytics की रिपोर्ट के अनुसार, ईवी गाड़ियों में ब्रेक और टायर से निकलने वाला पार्टिकुलेट मैटर (PM) पेट्रोल और डीजल वाहनों की तुलना में 1850 गुना अधिक हो सकता है। इसका मुख्य कारण है इन गाड़ियों का वजन, जो बैटरी के कारण काफी बढ़ जाता है। भारी बैटरी से ब्रेक पैड और टायर पर ज्यादा दबाव पड़ता है, जिससे ज्यादा घिसाव और PM उत्सर्जन होता है।

लिथियम और कोबाल्ट जैसी धातुएं बना रही हैं समस्या

ईवी गाड़ियों में लिथियम-आयन बैटरियों का उपयोग होता है, जिसमें 8 किलो लिथियम, 8-10 किलो कोबाल्ट और 35 किलो मैंगनीज की आवश्यकता होती है। कोबाल्ट और लिथियम दोनों ही दुर्लभ मेटल हैं, जिनकी माइनिंग पर्यावरण को गहरा नुकसान पहुंचाती है। कंपनियां अब कोबाल्ट की जगह निकल का इस्तेमाल कर रही हैं, लेकिन निकल की माइनिंग भी बेहद हानिकारक है।

समानताएं, फिर भी अंतर

ईवी और पारंपरिक गाड़ियों में चेचिस और अन्य कॉम्पोनेंट्स लगभग समान होते हैं, अंतर केवल ईंधन में है। परंतु यह अंतर ही पर्यावरण पर सबसे गहरा असर डाल रहा है।

ध्यान दें

हालांकि शहरी इलाकों में ईवी से स्थानीय वायु प्रदूषण कम होता है, लेकिन बड़े पैमाने पर देखें तो ये वाहन ग्लोबल कार्बन फुटप्रिंट बढ़ा सकते हैं। इसलिए EV को पूरी तरह 'ग्रीन विकल्प' कहना जल्दबाज़ी हो सकती है।

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