ट्रंप का वेनेजुएला प्लान, (डिजाइन फोटो) 
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'ड्रिल, बेबी, ड्रिल' का खौफ; ट्रंप के इन 3 शब्दों ने वेनेजुएला को किया तबाह, क्या अब दुनिया की बारी?

Trump Drill Baby Drill Project: डोनाल्ड ट्रंप का 'ड्रिल, बेबी, ड्रिल' नारा वेनेजुएला के लिए काल बन गया है। तेल भंडार पर कब्जे और पर्यावरण विनाश की इस खतरनाक वैश्विक नीति को विस्तार से समझें।

अमन उपाध्याय

What is Trump Drill Baby Drill Policy:  वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मदुरो की गिरफ्तारी और 'ड्रिल, बेबी, ड्रिल' की गूंज ने पूरी दुनिया को हिला दिया है। ट्रंप अब अमेरिका को दुनिया का 'एनर्जी दादा' बनाना चाहते हैं, लेकिन इसके पीछे तेल की गंदी राजनीति और जलवायु परिवर्तन का एक बड़ा खतरा छिपा है।

क्या है 'ड्रिल, बेबी, ड्रिल' ?

'ड्रिल, बेबी, ड्रिल' महज एक नारा नहीं, बल्कि अमेरिका में बिना रुके तेल और गैस निकालने की एक आक्रामक नीति है। इसका मुख्य उद्देश्य अमेरिका को विदेशी तेल पर निर्भरता से मुक्त करना, तेल की कीमतें कम करना और अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाना है। यह नारा पहली बार 2008 में रिपब्लिकन नेशनल कन्वेंशन में माइकल स्टील द्वारा इस्तेमाल किया गया था, जिसे बाद में सारा पेलिन और अब डोनाल्ड ट्रंप ने अपना सबसे बड़ा हथियार बना लिया है।

वेनेजुएला पर ट्रंप का 'कब्जा' और तेल का खेल

डोनाल्ड ट्रंप ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मदुरो और उनकी पत्नी को गिरफ्तार कर दुनिया को चौंका दिया है। ट्रंप की नजर अब वेनेजुएला के 300 अरब बैरल के दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडार पर है। ट्रंप का कहना है कि अमेरिकी कंपनियां वहां जाकर तेल निकालेंगी और खर्च की भरपाई करेंगी। विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप लैटिन अमेरिका को एक 'संसाधन कॉलोनी' बनाने की कोशिश कर रहे हैं।

ट्रंप का 'ड्रिल, बेबी, ड्रिल' प्लान (फोटो सो. एआई)

पर्यावरण के लिए 'डेथ वारंट'

विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि वेनेजुएला का तेल बहुत 'गंदा' है, जो भारी मात्रा में कार्बन और मीथेन उत्सर्जित करता है। अगर वहां उत्पादन बढ़ाया गया, तो सालाना 550 मिलियन टन कार्बन डाइऑक्साइड निकलेगी, जो जलवायु के लिए विनाशकारी होगा। अमेरिका के भीतर भी ड्रिलिंग और 'फ्रैकिंग' से जल स्रोत जहरीले हो रहे हैं और हवा प्रदूषित हो रही है।

वैश्विक अर्थव्यवस्था और राजनीति पर असर

ट्रंप की इस नीति से तेल की कीमतें गिर सकती हैं जो रूस और सऊदी अरब जैसे तेल निर्यातक देशों की अर्थव्यवस्था को चरमरा सकती है। अमेरिका अब एक नेट एक्सपोर्टर बन चुका है, जिससे उसकी भू-राजनीतिक ताकत तो बढ़ेगी, लेकिन लंबे समय में यह दुनिया को क्लाइमेट क्राइसिस में धकेल देगा। चीन जैसे देश जहां रिन्यूएबल एनर्जी में निवेश कर रहे हैं, वहीं अमेरिका का जीवाश्म ईंधन पर अड़े रहना उसे भविष्य की तकनीक में पीछे छोड़ सकता है।

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