सांकेतिक तस्वीर (AI जनरेटेड) 
विदेश

मध्य एशिया में भारत-चीन पर नया खतरा, मुस्लिम वर्ल्ड बना रहा 'महारण' का समीकरण, कौन-कौन लिख रहा तबाही की पटकथा?

World News: दुनिया की राजनीति में एक बड़ा और गहरा बदलाव देखने को मिल रहा है। मध्य एशिया में तुर्की, सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच रक्षा और रणनीति को लेकर एक नई और मजबूत दोस्ती आकार ले रही है।

अभिषेक सिंह

Central Asia Strategy: दुनिया की राजनीति में एक बड़ा और गहरा बदलाव देखने को मिल रहा है। तुर्की, सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच रक्षा और रणनीति को लेकर एक नई और मजबूत दोस्ती आकार ले रही है। हालांकि यह तालमेल अभी पूरी तरह से लिखित समझौते के रूप में सामने नहीं आया है, लेकिन इसका असर मध्य पूर्व से लेकर दक्षिण एशिया और चीन की सीमाओं तक महसूस किया जाने लगा है।

मुस्लिम देशों की राजनीति में यह नया समीकरण पुराने तौर-तरीकों को चुनौती दे रहा है। यह गठजोड़ केवल तीन देशों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके तार मध्य एशिया तक जुड़ रहे हैं। इस नई साझेदारी में हर देश की अपनी अलग भूमिका है। मध्य एशिया में यह भारत के लिए चिंता का सबब हो सकता है। साथ ही पाकिस्तान के दोस्त की भी नींद उड़ाने वाला है।

कैसे लिखी जा रही तबाही की स्क्रिप्ट?

दरअसल, तुर्की अपनी पुरानी ऐतिहासिक पहचान को फिर से जिंदा करना चाहता है, सऊदी अरब अपनी आर्थिक ताकत और धार्मिक प्रभाव का इस्तेमाल कर रहा है, जबकि पाकिस्तान अपनी सैन्य क्षमता के साथ इन दोनों के बीच एक पुल का काम कर रहा है। विश्लेषकों का मानना है कि यह नया गुट दुनिया के नक्शे पर प्रभाव के नए क्षेत्र बना सकता है।

हथियार और पैसे की नई साझेदारी

तुर्की की भूमिका इसमें काफी अहम है। साल 2010 के बाद से तुर्की ने ऑर्गनाइजेशन ऑफ तुर्किक स्टेट्स के माध्यम से अज़रबैजान, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान और उज़्बेकिस्तान जैसे देशों के साथ अपने रिश्ते बहुत मजबूत किए हैं। बात अब सिर्फ संस्कृति या भाषा तक सीमित नहीं रही है। तुर्की ने इन देशों को अपने मशहूर बायरकतार टीबी2 ड्रोन, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली और सैन्य प्रशिक्षण देना शुरू कर दिया है। यह समूह अब एक रणनीतिक ताकत बनता जा रहा है।

मध्य एशिया के नए समीकरण (इन्फोग्राफिक-AI)

दूसरी तरफ सऊदी अरब इस तिकड़ी में अपनी अलग भूमिका निभा रहा है। सऊदी अरब के पास तुर्की जैसी भाषाई पकड़ तो नहीं है, लेकिन सुन्नी मुस्लिम दुनिया में उसका धार्मिक प्रभाव और पैसे की ताकत बहुत बड़ी है। पिछले एक दशक में सऊदी अरब ने अपनी नीति बदली है। अब वह पाकिस्तान में ऊर्जा, इंफ्रास्ट्रक्चर और रक्षा क्षेत्र में भारी निवेश कर रहा है। साथ ही तुर्की के साथ मिलकर सैन्य अभ्यास भी कर रहा है, जो बदलती हुई प्राथमिकताओं को दिखाता है।

चीन के लिए खतरे की घंटी क्यों?

आर्थिक तंगी से जूझ रहा पाकिस्तान इस नए समीकरण में एक सैन्य मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है। पाकिस्तान की परमाणु शक्ति उसे इस पूरे इलाके में खास महत्व दिलाती है। साल 2025 में सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच हुआ स्ट्रैटेजिक म्यूचुअल डिफेंस एग्रीमेंट इस बात का इशारा है कि पाकिस्तान को बाहरी सुरक्षा का भरोसा मिल रहा है। इसके अलावा, तुर्की की रक्षा कंपनियों के लिए पाकिस्तान एक बड़ा बाजार बनकर उभरा है।

विशेषज्ञों के मुताबिक, जब तुर्की का ऐतिहासिक प्रभाव और सऊदी अरब का धार्मिक नेटवर्क मध्य एशिया में एक साथ काम करेंगे, तो वहां पहले से मौजूद शक्तियों के लिए चुनौती खड़ी हो सकती है। चीन के लिए यह घटनाक्रम सबसे ज्यादा चिंता का विषय है। चीन हमेशा से अपने पश्चिमी इलाके शिनजियांग में स्थिरता को लेकर सतर्क रहता है। अगर तुर्की और सुन्नी मुस्लिम देशों का प्रभाव चीन की सीमाओं तक पहुंचता है, तो बीजिंग के लिए अपनी आंतरिक और सीमा पार की सुरक्षा को संभालना मुश्किल हो सकता है।

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