श्रीलंकाई नागरिक की प्रतीकात्मक चित्र। सोर्स: फोटो AI से बनाया गया है।
विदेश

सऊदी अरब में हिंदू युवक की फांसी से कैसे बची जान? मोहम्मद पैगंबर का किया था अपमान

Saudi Arabia Execution: सऊदी अरब में दो बांग्लादेशी नागरिकों को फांसी दिए जाने के बाद ढाका की कूटनीतिक भूमिका पर सवाल उठे हैं। वहीं, श्रीलंका ने अपने नागरिक की मौत की सजा पलटवाने में सफलता हासिल की।

अमन कुमार पाण्डेय

Highlights

  • सऊदी अरब ने 14 अक्टूबर को दो बांग्लादेशी नागरिकों को फांसी दी।

  • दोनों पर मक्का की मस्जिद में कथित अनैतिक कृत्य करने का आरोप था।

  • बांग्लादेश सरकार को फांसी की जानकारी सजा दिए जाने के बाद मिली।

  • श्रीलंका ने अपने नागरिक की मौत की सजा पलटवाने में सफलता पाई।

  • श्रीलंका ने राजनयिक बातचीत और कानूनी सहायता के जरिए मामले में हस्तक्षेप किया।

  • दोनों मामलों ने विदेशों में नागरिकों की सुरक्षा और कांसुलर सहायता पर सवाल खड़े किए।

Saudi Arabia Execution Case: सऊदी अरब में दो बांग्लादेशी नागरिकों को मौत की सजा दिए जाने के मामले ने ढाका की कूटनीतिक भूमिका पर सवाल खड़े कर दिए हैं। 14 अक्टूबर को नजरुल इस्लाम और स्वीटी अख्तर को फांसी दी गई। सऊदी अधिकारियों के मुताबिक, दोनों को मक्का की एक मस्जिद के भीतर कथित अनैतिक कृत्य करने का दोषी पाया गया था।

बांग्लादेश सरकार का कहना है कि उसे इस कार्रवाई की जानकारी फांसी दिए जाने के बाद मिली। इसी दौरान श्रीलंका अपने एक नागरिक की मौत की सजा रद्द कराने में सफल रहा। दोनों मामलों के अंतर ने बांग्लादेश की कांसुलर सहायता और राजनयिक प्रयासों पर बहस छेड़ दी है।

मक्का में काम करते थे दोनों बांग्लादेशी नागरिक

सऊदी अरब के गृह मंत्रालय के अनुसार, नजरुल इस्लाम और स्वीटी अख्तर को इस्लामी कानून के तहत ताजीर श्रेणी में मौत की सजा दी गई। नजरुल बांग्लादेश के ब्राह्मणबरिया और स्वीटी तंगैल की रहने वाली थीं। दोनों सऊदी अरब में अल-मजल कंपनी के लिए सफाईकर्मी के रूप में काम करते थे।

सऊदी अधिकारियों ने कहा कि मामले में न्यायिक समीक्षा के बाद शाही आदेश जारी किया गया था। हालांकि, कथित अपराध की विस्तृत जानकारी, मुकदमे की पूरी प्रक्रिया और दोनों को उपलब्ध कराए गए कानूनी बचाव के बारे में सार्वजनिक रूप से ज्यादा विवरण नहीं दिया गया।

बांग्लादेश सरकार को लेकर क्यों उठे सवाल?

बांग्लादेशी अधिकारियों के अनुसार, सरकार को दोनों नागरिकों की फांसी की जानकारी सजा दिए जाने के बाद मिली। इस घटनाक्रम के बाद सवाल उठे कि क्या हिरासत और मुकदमे के दौरान पर्याप्त कांसुलर सहायता उपलब्ध कराई गई थी।

मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और विश्लेषकों ने मामले में सक्रिय राजनयिक हस्तक्षेप, अदालती दस्तावेज हासिल करने और आरोपियों के लिए कानूनी प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने की जरूरत पर जोर दिया। विदेशी नागरिकों को हिरासत में लिए जाने के मामलों में कांसुलर संपर्क महत्वपूर्ण होता है। वियना कन्वेंशन के अनुच्छेद 36 में भी संबंधित कांसुलर अधिकारों का प्रावधान है।

श्रीलंका ने कैसे बचाई सऊदी अरब में अपने नागरिक की जान?

इसी अवधि में श्रीलंका के नागरिक अनोजान शिवरासा का मामला चर्चा में आया। उन्हें सऊदी अरब में सोशल मीडिया पर कथित ईशनिंदा वाली पोस्ट के मामले में मौत की सजा सुनाई गई थी। श्रीलंका के विदेश मंत्रालय ने सितंबर में मामले को लेकर राजनयिक बातचीत की पुष्टि की थी।

इसके बाद श्रीलंका ने अपने राजदूत को सक्रिय किया, जिन्होंने जेल में शिवरासा से मुलाकात की। कोलंबो ने अपील की प्रक्रिया में सहायता के लिए विशेष कानूनी टीम भी भेजी। 13 अक्टूबर को सऊदी अरब के सुप्रीम कोर्ट ने शिवरासा की मौत की सजा पलट दी। यह फैसला दोनों बांग्लादेशी नागरिकों को फांसी दिए जाने से एक दिन पहले आया।

दोनों मामलों से क्या सवाल उठे?

श्रीलंका की कोशिशों और बांग्लादेश के मामले के बीच तुलना करते हुए विशेषज्ञों ने समय पर कांसुलर संपर्क, कानूनी सहायता और राजनयिक हस्तक्षेप के महत्व को रेखांकित किया है। हालांकि, दोनों मामलों की कानूनी परिस्थितियां अलग थीं।

इसलिए केवल इन घटनाओं के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि बांग्लादेश की किसी एक चूक के कारण फांसी हुई। फिर भी, यह मामला विदेशों में काम करने वाले नागरिकों की सुरक्षा और संकट के समय सरकारों की जिम्मेदारी पर गंभीर चर्चा को जन्म देता है।

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