फ्रांस सरकार ने हिंसक प्रदर्शनों के बाद सेना तैनात करने की घोषणा की
पेरिस समेत कई शहरों में प्रदर्शन के दौरान तोड़फोड़ और लूटपाट हुई
इटली, स्पेन और अन्य यूरोपीय देशों में भी विरोध प्रदर्शन जारी हैं
France Protests: फ्रांस में खराब शिक्षा व्यवस्था को लेकर हिंसक प्रदर्शनों का दौर जारी है। छात्र संगठनों ने शनिवार को एक बड़े प्रदर्शन का आह्वान किया है। इसी बीच फ्रांस की इमैनुएल मैक्रों सरकार ने सुरक्षा व्यवस्था को लेकर कई बड़े फैसले किए हैं। सरकार ने ऐलान किया है कि पुलिस की मदद के लिए देश के कई शहरों में अब सेना को भी तैनात किया जाएगा।
फ्रांस के प्रधानमंत्री सेबास्टियन लेकोर्नू ने मंगलवार को कहा कि शनिवार को होने वाली तैनाती 'बड़े पैमाने पर' होगी। लेकोर्नू ने कहा कि सरकार की पहली प्राथमिकता हिंसा के बाद देश में व्यवस्था बहाल करना है। सरकार ने यह फैसला 17 अक्टूबर को हुए प्रदर्शन के दौरान हुई लूट-पाट की घटनाओं के बाद लिया है।
17 अक्टूबर को छात्र संगठनों ने स्कूलों की खराब व्यवस्था और शिक्षकों की कमी के खिलाफ हिंसक प्रदर्शन किए। इस दौरान पेरिस, मार्सिले, लियोन और फ्रांस के दूसरे शहरों में भारी हिंसा, तोड़फोड़ और लूटपाट की घटनाएं हुई थीं। इसके बाद कानून-व्यवस्था को लेकर सरकार पर सवाल उठाए गए थे। छात्रों के प्रदर्शनों के चलते पहले इमैनुएल मैक्रों सरकार दबाव में है। ऐसे में वह सुरक्षा व्यवस्था को लेकर किसी भी प्रकार की कोताही नहीं चाहती है।
फ्रांस सरकार ने शनिवार को होने वाले प्रदर्शनों से पहले सुरक्षा-व्यवस्था को मजबूत करने का फैसला किया है। पीएम लेकोर्नू ने इसे हिंसा और गणराज्य के बीच चुनाव के तौर पर पेश किया। उन्होंने फ्रांस में हो रहे प्रदर्शनों के लिए वामपंथी समूहों को जिम्मेदार ठहराया। हालांकि इन संगठनों ने सरकार के आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। उनका कहना है कि प्रदर्शन महंगाई और जीवन-यापन की बढ़ती लागत को लेकर हो रहा है। इसे लेकर लोगों में गुस्सा है जिसे सरकार कम आंक रही है।
इस समय फ्रांस, इटली, अल्बानिया, स्पेन, बेल्जियम और पुर्तगाल समेत यूरोप के करीब नौ देशों में सरकारों के खिलाफ प्रदर्शन हो रहे हैं। फ्रांस में जहां मुद्दा शिक्षा से जुड़ा है, वहीं इटली में मामला बढ़ती महंगाई का है। इसके अलावा स्पेन में घरों की बढ़ती कीमतें मुद्दा बनी हुई हैं। यह स्थिति 2010-11 के अरब स्प्रिंग जैसी है, जब ट्यूनीशिया में सरकार के भ्रष्टाचार से परेशान होकर एक फल वाले ने पुलिस स्टेशन के सामने आत्महत्या कर ली थी।
इस घटना से ट्यूनीशिया के लोगों का गुस्सा भड़क उठा और हिंसक प्रदर्शनों के बाद तानाशाह जीन अल-आबिदीन बेन अली को 23 साल बाद अपनी कुर्सी छोड़नी पड़ी थी। इस घटना ने मिडिल ईस्ट के दूसरे देशों जैसे मिस्र, सीरिया, लीबिया, यमन, बहरीन समेत उत्तरी अफ्रीकी देशों सरकारों के खिलाफ प्रदर्शन हुए थे। इस दौरान होस्नी मुबारक, अली अब्दुल्लाह सालेह और मुआम्मार गद्दाफी जैसे कई तानाशाहों को या तो जान बचाने के लिए कुर्सी छोड़नी पड़ी या फिर जनता ने उन्हें जान से मार दिया। यूरोप में हो रहे प्रदर्शन भी कुछ हद तक इसी प्रकार के हैं।