ढाका: बांग्लादेश की सियासत एक बार फिर गरमाई हुई है। चुनाव की तारीख को लेकर विवाद इस कदर बढ़ चुका है कि देशव्यापी आंदोलन की धमकियों के बीच राजनीतिक अस्थिरता और गहराती जा रही है। अंतरिम सरकार के मुखिया यूनुस जहां जून 2026 में चुनाव कराने की जिद पर अड़े हैं, वहीं विपक्षी दल बीएनपी इसे जनता की आवाज दबाने की साजिश मान रहा है। दिसंबर 2025 तक चुनाव कराने की मांग करते हुए पार्टी ने सरकार पर चुनावी धांधली का आरोप लगाया है। हालात ऐसे बनते जा रहे हैं कि सेना भी हस्तक्षेप के संकेत दे रही है।
बांग्लादेश में मौसम, त्योहार और सार्वजनिक परीक्षाओं को लेकर चुनाव टालने के पीछे जो तर्क दिए जा रहे हैं, उन्हें विपक्ष स्वीकार नहीं कर रहा। उनका कहना है कि चुनाव टालना महज एक राजनीतिक हथकंडा है, ताकि सत्ता से दूर रह चुकी ताकतें फिर से समीकरण बदल सकें। निवेशक भी असमंजस में हैं और नया निवेश ठप पड़ा है, जिससे देश की अर्थव्यवस्था को गहरा झटका लग रहा है।
सियासी चाल में फंसा बांग्लादेश का लोकतंत्र
अंतरिम सरकार के प्रमुख यूनुस की ओर से चुनाव 2026 में कराने की योजना पर राजनीतिक घमासान मच गया है। बीएनपी ने इसे सत्ता की साजिश करार देते हुए कहा है कि इस फैसले से न सिर्फ जनता की भावनाएं कुचली जा रही हैं, बल्कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया भी खतरे में है। पार्टी ने दिसंबर तक चुनाव कराने की मांग करते हुए सड़कों पर उतरने की चेतावनी दी है। उधर, सेना प्रमुख की तरफ से भी स्पष्ट संदेश आ चुका है कि लोकतंत्र को और ज्यादा टालने का मतलब देश को संकट में डालना होगा।
त्योहार, मौसम और परीक्षाओं के बहाने चुनाव टालने की रणनीति?
बीएनपी का कहना है कि रमजान, ईद, बकरीद, कालबैशाखी तूफान और सार्वजनिक परीक्षाएं 2026 की पहली छमाही को पूरी तरह व्यस्त बना देती हैं, ऐसे में चुनाव कराना मुश्किल ही नहीं, बल्कि अव्यवस्थित भी होगा। उनका तर्क है कि इतिहास में भी अधिकांश राष्ट्रीय चुनाव दिसंबर-जनवरी में ही हुए हैं, जिससे यूनुस की टाइमलाइन पर सवाल खड़े हो रहे हैं। साथ ही, विपक्षी दलों का यह भी कहना है कि जब तक स्पष्ट रोडमैप नहीं आता, तब तक देश में राजनीतिक स्थिरता और निवेश का माहौल बनना संभव नहीं है।