Rise Of Hitler In Germany: 20 अप्रैल को एडोल्फ हिटलर का जन्मदिन होता है एक ऐसा नाम, जो इतिहास के सबसे विवादित और भयावह अध्यायों में दर्ज है। अक्सर यह सवाल उठता है कि आखिर एक ऐसा व्यक्ति, जो नफरत और कट्टरता से भरा हुआ था, कैसे यूरोप के एक विकसित देश जर्मनी का शासक बन गया और लाखों लोगों का समर्थन हासिल कर पाया। इसका जवाब उस दौर की परिस्थितियों और हिटलर के नेतृत्व शैली को समझे बिना अधूरा है।
हिटलर के उदय को समझने के लिए पहले विश्व युद्ध के बाद की जर्मनी की स्थिति पर नजर डालना जरूरी है। युद्ध में हार के बाद जर्मनी को वर्साय की संधि की कठोर शर्तों का सामना करना पड़ा, जिससे देश आर्थिक और मानसिक रूप से टूट गया। जनता में अपमान और असंतोष गहराता गया। इसी माहौल में हिटलर ने अपने भाषणों के जरिए लोगों की भावनाओं को आवाज दी और खुद को एक ऐसे नेता के रूप में पेश किया जो जर्मनी को फिर से महान बना सकता है।
1920 के दशक के अंत तक हिटलर की नाजी पार्टी सीमित प्रभाव वाली पार्टी थी। 1928 के चुनाव में उसे केवल 2.6प्रतिशत वोट मिले थे। लेकिन 1929 की आर्थिक मंदी ने हालात बदल दिए। बैंकिंग सिस्टम चरमरा गया, बेरोजगारी बढ़ी और लोग निराशा में डूब गए। ऐसे समय में हिटलर के भाषणों ने लोगों को उम्मीद दी। वे खुद को एक ऐसे नेता के रूप में प्रस्तुत करते थे, जो व्यक्तिगत लाभ के बजाय केवल राष्ट्र के हित के लिए काम करेगा।
हिटलर पारंपरिक नेता नहीं थे। वह कर कटौती या बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं की बात नहीं करते थे बल्कि लोगों को मुक्ति का वादा देते थे। उनकी भाषा सरल लेकिन भावनात्मक थी, जो सीधे जनता के दिल तक पहुंचती थी। उनके भीतर की नफरत और पूर्वाग्रह उस समय कई जर्मनों की सोच से मेल खाते थे। वे खुद को आर्य श्रेष्ठता के प्रतीक के रूप में पेश करते थे और यहूदियों व कम्युनिस्टों को देश की समस्याओं का जिम्मेदार ठहराते थे।
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हालांकि हिटलर को हर कोई पसंद नहीं करता था लेकिन आर्थिक संकट और अस्थिरता ने उनके समर्थन को तेजी से बढ़ाया। कुछ ही वर्षों में वे जर्मनी के चांसलर बन गए। यह कहानी केवल एक व्यक्ति के उदय की नहीं, बल्कि उस समाज की भी है जो कठिन समय में कट्टर विचारधारा की ओर झुक गया। आज, हिटलर का जन्मदिन हमें यह याद दिलाता है कि आर्थिक संकट, असंतोष और गलत नेतृत्व का मेल किस तरह इतिहास को भयावह दिशा में ले जा सकता है।