TMC Allegations over Voter List: ममता बनर्जी की नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस ने आरोप लगाया था कि भाजपा के कार्यकर्ता बड़ी संख्या में फॉर्म 6 जमा करा रहे हैं। इसके जरिए मतदाताओं के नाम लिस्ट में जुड़वाए जा रहे हैं। उसकी इस दलील पर सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि इसमें कुछ गलत नहीं है और ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है। इस तरह टीएमसी को करारा झटका लगा है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच ने राज्य में SIR के खिलाफ दायर याचिकाओं की सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया।
चीफ जस्टिस ने अपने आदेश में कहा कि ऐसा हर बार होता है। पहली बार नहीं हो रहा है। आप आपत्तियां दायर कर सकते हैं। बेंच का कहना था कि यदि आपको किसी का नाम जोड़े जाने से आपत्ति है तो उस पर चुनाव आयोग में रिपोर्ट कर सकते हैं।
टीएमसी का पक्ष रख रहे वकील कल्याण बनर्जी ने एक मामले का उदाहरण देते हुए कहा कि एक ही व्यक्ति ने 30 हजार फॉर्म 6 जमा किए हैं। फॉर्म 6 का प्रयोग वोटर लिस्ट में नाम शामिल करने या फिर संसदीय क्षेत्र बदलने की स्थिति में किया जाता है। अधिवक्ता ने कहा कि पूरक सूचियां आ चुकी हैं। इसके बाद भी चुनाव आयोग के नए नोटिफिकेशन में फॉर्म 6 स्वीकार करने की बात कही गई है। लेकिन जब वोटर लिस्ट की पूरक सूची आ गई है और प्रक्रिया बढ़ चुकी है तो फिर फॉर्म 6 क्यों मंगाए जा रहे हैं। उनके बंडल तैयार होकर आ रहे हैं। मैं किसी राजनीतिक दल पर इसके लिए आरोप नहीं लगा रहा।
हालांकि, चीफ जस्टिस ने टीएमसी की इन आपत्तियों को गंभीरता से नहीं लिया। उन्होंने कहा कि इस तरह की बात करना जल्दबाजी होगा। पहले पूरी प्रक्रिया को समझने की जरूरत है। अदालत ने कहा कि हम इस मामले को बंद नहीं कर रहे हैं, लेकिन समय आने पर देखेंगे। वहीं चुनाव आयोग का पक्ष रखने वाले वकील डीएस नायडू ने कहा कि नियम यह कहता है कि मतदाताओं के नाम उम्मीदवारों के नामांकन के आखिरी दिन तक शामिल किए जा सकते हैं। उन्होंने कहा कि यदि कोई आज ही 18 साल का हुआ है और वह मतदाता के तौर पर नाम जुड़वाना चाहता है तो वह ऐसा कर सकता है।
इस पर बनर्जी ने कहा कि नए नाम जिनके शामिल किए जा रहे हैं। उनके बारे में हर बूथ पर सार्वजनिक सूचना जारी होना चाहिए। ऐसा होने पर ही आपत्तियां दायर हो सकेंगी। इस पर जस्टिस बागची ने दखल दिया। उन्होंने कहा कि एक चीज मतदाता सूची में संशोधन है। दूसरी चीज वह वोटर लिस्ट है, जिसके आधार पर चुनाव होना है।
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बागची ने आगे कहा कि चुनाव उसी सूची के आधार पर होते हैं, जो आयोग की ओर से तय तारीख तक अपडेट हो जाती है। इसलिए यदि कोई उसके बाद शामिल भी हुआ तो वह इलेक्शन में मतदान का अधिकार नहीं रखता। इससे पहले शीर्ष अदालत ने कहा था कि बंगाल में SIR की प्रक्रिया को पूर्ण कराने के लिए न्यायिक अधिकारी नियुक्त किए जाएंगे। आज चीफ जस्टिस ने कहा कि सभी आपत्तियों पर 7 अप्रैल तक फैसला लिया जाएगा।