Mamata Banerjee High Court Setback LoP Controversy: पश्चिम बंगाल की राजनीति में चल रहे सत्ता संघर्ष के बीच ममता बनर्जी सरकार को कलकत्ता हाई कोर्ट से एक बड़ा कानूनी और राजनीतिक झटका लगा है। राज्य विधानसभा में विपक्ष के नेता (LoP) के पद को लेकर छिड़े विवाद में कोर्ट ने फिलहाल विधानसभा अध्यक्ष (स्पीकर) के फैसले में हस्तक्षेप करने या उस पर रोक लगाने से साफ इनकार कर दिया है। जस्टिस कृष्णा राव की पीठ ने स्पष्ट किया कि इस मामले में अंतरिम आदेश देने के लिए कोई प्रथम दृष्टया आधार नहीं मिला है।
यह विवाद तब शुरू हुआ जब पश्चिम बंगाल विधानसभा के अध्यक्ष रथिन बसु ने ऋतब्रत बनर्जी को विपक्ष का नेता नियुक्त कर दिया। इस फैसले को चुनौती देते हुए तृणमूल कांग्रेस (TMC) के वरिष्ठ विधायक और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के करीबी माने जाने वाले शोवनदेब चट्टोपाध्याय ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। याचिकाकर्ता ने मांग की थी कि स्पीकर के इस आदेश पर तुरंत अंतरिम रोक लगाई जाए।
बुधवार को हुई सुनवाई के दौरान जस्टिस कृष्णा राव ने स्पीकर की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए। कोर्ट ने एडिशनल एडवोकेट जनरल से पूछा कि आखिर 9 मई को मिले उस पत्र पर कोई कार्रवाई क्यों नहीं की गई, जिसमें शोवनदेब चट्टोपाध्याय को विपक्ष का नेता बनाने का प्रस्ताव दिया गया था? कोर्ट ने गौर किया कि जहां पहले पत्र को नजरअंदाज किया गया, वहीं बागी गुट द्वारा 3 जून को दिए गए दूसरे पत्र पर त्वरित कार्रवाई करते हुए ऋतब्रत को LoP घोषित कर दिया गया। हालांकि, इन टिप्पणियों के बावजूद कोर्ट ने वर्तमान स्थिति को बदलने से इनकार कर दिया और अगली सुनवाई के लिए 28 जुलाई की तारीख तय की है।
इस पूरे विवाद की जड़ विधानसभा चुनावों में तृणमूल कांग्रेस की करारी हार और उसके बाद पार्टी के भीतर हुई बगावत है। पार्टी नेतृत्व ने जहां शोवनदेब चट्टोपाध्याय को नेता बनाने का निर्णय लिया था, वहीं ऋतब्रत ने 58 बागी विधायकों का समर्थन जुटाकर अपनी अलग राह पकड़ ली।
हालांकि टीएमसी नेतृत्व ने ऋतब्रत को 'पार्टी विरोधी गतिविधियों' के कारण 1 जून को पार्टी से निष्कासित कर दिया था, लेकिन वे सदन में बहुमत (विपक्षी विधायकों के बीच) के आधार पर अपनी जगह बचाने में सफल रहे।
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मामला केवल राजनीतिक पद तक सीमित नहीं है इसमें अब आपराधिक मोड़ भी आ गया है। कई विधायकों ने आरोप लगाया है कि शोवनदेब चट्टोपाध्याय के समर्थन वाले दस्तावेजों पर उनके फर्जी हस्ताक्षर (Forged Signatures) किए गए थे। इस मामले की अब सीआईडी (CID) जांच कर रही है, जिसमें मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी की भूमिका भी जांच के दायरे में है।
फिलहाल, हाई कोर्ट के इस फैसले के बाद ऋतब्रत बनर्जी ही विपक्ष के नेता बने रहेंगे और ममता सरकार को कानूनी लड़ाई के अगले दौर के लिए जुलाई तक इंतजार करना होगा।