राहुल गांधी के बयान पर FIR दर्ज कराने की मांग खारिज
कोर्ट बोला- सरकार की नीतियों से असहमति को अपराध नहीं मान सकते
हाईकोर्ट ने BNS की धारा 152 का हवाला किया
Allahabad High Court: लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को इलाहाबाद हाईकोर्ट से बड़ी कानूनी राहत मिली है। विदेश में दिए गए उनके एक बयान को लेकर आपराधिक मुकदमा दर्ज करने की मांग वाली याचिका हाईकोर्ट ने खारिज कर दी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी जनप्रतिनिधि के सार्वजनिक बयान या सरकार की नीतियों पर असहमति को महज इस आधार पर आपराधिक कृत्य नहीं माना जा सकता कि उससे कुछ लोगों की भावनाएं आहत हुई हैं। आपराधिक कार्रवाई के लिए कानून में निर्धारित अपराध के आवश्यक तत्वों का मौजूद होना जरूरी है।
न्यायमूर्ति विक्रम डी. चौहान की एकल पीठ ने नागेश्वर मिश्रा और एक अन्य की ओर से दाखिल याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। मामला राहुल गांधी के विदेश दौरे के दौरान सिख समुदाय की धार्मिक स्वतंत्रता और सुरक्षा को लेकर दिए गए बयान से संबंधित था। याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि उनके बयान से देश की संप्रभुता, एकता और अखंडता प्रभावित हो सकती है तथा अलगाववादी गतिविधियों को प्रोत्साहन मिल सकता है। इसी आधार पर भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 152 के तहत एफआईआर दर्ज कराने की मांग की गई थी।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने फैसले में संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) के तहत मिले अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार को महत्वपूर्ण बताया। अदालत के अनुसार लोकतांत्रिक व्यवस्था में विचारों की स्वतंत्र अभिव्यक्ति और असहमति के लिए पर्याप्त जगह होनी चाहिए।
सरकार की नीतियों या सामाजिक मुद्दों पर सवाल उठाना जनप्रतिनिधियों की सार्वजनिक भूमिका का हिस्सा है। केवल किसी बयान से असहमति या उसके संभावित राजनीतिक प्रभाव के आधार पर आपराधिक मुकदमा चलाना उचित नहीं है।
अदालत ने धारा 152 के कानूनी प्रावधानों की व्याख्या करते हुए कहा कि इसके तहत अपराध बनने के लिए यह स्थापित होना जरूरी है कि संबंधित कृत्य का उद्देश्य जानबूझकर अलगाव, सशस्त्र विद्रोह या विध्वंसकारी गतिविधियों को उकसाना था। केवल आशंका या बयान की किसी खास व्याख्या से अपराध की पुष्टि नहीं हो सकती। किसी तीसरे पक्ष द्वारा बयान का राजनीतिक या अन्य उद्देश्य से इस्तेमाल किए जाने पर भी वक्ता को स्वत: जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
राहुल गांधी से जुड़े इस मामले में वाराणसी की निचली अदालत और पुनरीक्षण अदालत पहले ही एफआईआर दर्ज कराने की मांग खारिज कर चुकी थीं। हाईकोर्ट ने उनके आदेशों में हस्तक्षेप करने का आधार नहीं पाया। इसी के साथ भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 528 के तहत दाखिल याचिका निरस्त कर दी।