हाईकोर्ट (सोर्स- सोशल मीडिया) 
प्रयागराज

ग्राम प्रधानों पर हाईकोर्ट सख्त; वित्तीय अनियमितता पर रिकवरी का आदेश, कहा- कानूनी प्रक्रिया का पालन जरूरी

Allahabad High Court: हाईकोर्ट ने फैसला दिया कि पूर्व ग्राम प्रधान से भी कार्यकाल के दौरान हुई वित्तीय अनियमितताओं की रिकवरी की जा सकती है, कार्रवाई केवल कानून में निर्धारित प्रक्रिया के तहत ही होगी।

स्निग्धा श्रीवास्तव

Allahabad High Court Verdict: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ग्राम पंचायतों में वित्तीय अनियमितताओं और सरकारी धन के दुरुपयोग से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि ग्राम प्रधान का कार्यकाल समाप्त होने या पद छोड़ने के बाद भी उसके कार्यकाल के दौरान हुए वित्तीय नुकसान की वसूली की जा सकती है। हालांकि अदालत ने यह भी कहा कि ऐसी कार्रवाई केवल कानून में निर्धारित प्रक्रिया का पालन करते हुए ही की जाएगी।

यह फैसला न्यायमूर्ति अजीत कुमार और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने प्रयागराज निवासी एवं पूर्व ग्राम प्रधान शिवपूजन तिवारी की याचिका पर सुनाया। अदालत ने उत्तर प्रदेश पंचायत राज अधिनियम की धारा 27 का विस्तृत विश्लेषण करते हुए कहा कि कानून में प्रयुक्त शब्द स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं कि पूर्व ग्राम प्रधान भी अपने कार्यकाल में हुई वित्तीय अनियमितताओं के लिए उत्तरदायी हो सकते हैं।

क्या है मामला

याचिकाकर्ता शिवपूजन तिवारी वर्ष 2010 से 2015 तक ग्राम प्रधान रहे। उनके कार्यकाल समाप्त होने के बाद शिकायत मिलने पर जिलाधिकारी ने जांच के आदेश दिए। जिला प्रोबेशन अधिकारी और जूनियर इंजीनियर की दो सदस्यीय समिति की रिपोर्ट के आधार पर वर्ष 2018 में पूर्व प्रधान के खिलाफ 14.84 लाख रुपये की रिकवरी (सरचार्ज) का आदेश जारी कर दिया गया। इस आदेश को पूर्व प्रधान ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

हाईकोर्ट ने क्यों दी राहत

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने माना कि पूर्व ग्राम प्रधान से वित्तीय नुकसान की वसूली की जा सकती है, लेकिन इसके लिए विधिक प्रक्रिया का पालन अनिवार्य है। अदालत ने कहा कि उत्तर प्रदेश पंचायत राज नियमावली के अनुसार सरचार्ज अथवा रिकवरी की जांच करने का अधिकार केवल मुख्य लेखा परीक्षा अधिकारी (सहकारी समितियां एवं पंचायत) को है। जिलाधिकारी द्वारा गठित सामान्य समिति को ऐसी जांच का अधिकार नहीं है।

खंडपीठ ने पाया कि इस मामले में जांच अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर कराई गई थी, जो विधिसम्मत नहीं थी। इसी प्रक्रिया संबंधी खामी के आधार पर अदालत ने जिलाधिकारी द्वारा जारी 14.84 लाख रुपये की रिकवरी का आदेश निरस्त कर दिया।

हाईकोर्ट के इस फैसले को पंचायत प्रशासन और वित्तीय जवाबदेही के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अदालत ने स्पष्ट संदेश दिया है कि पूर्व जनप्रतिनिधि भी अपने कार्यकाल की वित्तीय अनियमितताओं से बच नहीं सकते, लेकिन प्रशासन को कार्रवाई करते समय कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया और सक्षम प्राधिकारी का पालन करना होगा।

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