Highlights
पूर्व सैनिक सिक्योरिटी सर्विस को राहत
₹18.59 लाख बकाया और 6% ब्याज देने का आदेश
2018 से 2021 तक दीं सुरक्षा सेवाएं
भुगतान नहीं मिलने पर फर्म पहुंची हाईकोर्ट
Allahabad High Court Contractor Payment Order: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि राज्य सरकार या उसके संस्थान धन की कमी (लैक ऑफ फंड्स) का हवाला देकर किसी वेंडर या ठेकेदार के स्वीकृत संविदात्मक बकाए का भुगतान नहीं रोक सकते। यदि संबंधित फर्म अनुबंध के तहत अपनी सेवाएं पूरी कर चुकी है और भुगतान की देनदारी स्वीकार की जा चुकी है, तो केवल वित्तीय संकट का तर्क देकर भुगतान से इनकार करना उचित नहीं है।
अदालत ने यह टिप्पणी मेसर्स पूर्व सैनिक सिक्योरिटी सर्विस की याचिका पर सुनवाई के दौरान की। मामले में फर्म ने फिरोजाबाद दुग्ध उत्पादक सहकारी संघ लिमिटेड के अधीन विभिन्न इकाइयों में सुरक्षा सेवाएं उपलब्ध कराई थीं। भुगतान नहीं होने पर फर्म ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। अदालत ने बकाया भुगतान के साथ छह प्रतिशत की दर से ब्याज देने का आदेश दिया है।
याचिकाकर्ता मेसर्स पूर्व सैनिक सिक्योरिटी सर्विस को फिरोजाबाद दुग्ध उत्पादक सहकारी संघ लिमिटेड की विभिन्न इकाइयों में सुरक्षा सेवाएं प्रदान करने का ठेका मिला था। अनुबंध एक अक्टूबर 2018 से 31 मई 2021 तक प्रभावी रहा। फर्म के अनुसार, उसने निर्धारित अवधि में अनुबंध के मुताबिक सुरक्षा सेवाएं उपलब्ध कराईं, लेकिन इसके बावजूद उसे भुगतान नहीं मिला। फर्म का कुल 18,59,197.02 रुपये संविदात्मक बकाया लंबित था।
इसके अतिरिक्त 20 हजार रुपये की फिक्स्ड डिपॉजिट के रूप में जमा सुरक्षा राशि का भी भुगतान नहीं किया गया। लंबे समय तक भुगतान लंबित रहने के बाद फर्म ने संबंधित अधिकारियों से संपर्क किया और अपनी बकाया राशि जारी करने की मांग की।
बकाया भुगतान के लिए फर्म ने कई बार पत्राचार किया। प्रादेशिक कोऑपरेटिव डेयरी फेडरेशन की ओर से भुगतान के संबंध में निर्देश दिए जाने के बावजूद उसे राहत नहीं मिली। संबंधित पक्षों की ओर से धन की कमी का हवाला देकर भुगतान नहीं किए जाने पर फर्म ने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत इलाहाबाद हाईकोर्ट में रिट याचिका दाखिल की। याचिका में लंबित संविदात्मक भुगतान और सुरक्षा राशि जारी करने की मांग की गई थी। मामला सामने आने के बाद अदालत ने संविदात्मक दायित्वों और भुगतान में देरी के मुद्दे पर विचार किया।
मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति प्रकाश पाडिया और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने की। अदालत ने स्पष्ट किया कि वित्तीय कठिनाई अपने आप में स्वीकार किए गए संविदात्मक बकाए को रोकने का उचित आधार नहीं हो सकती। सरकारी संस्थानों को अनुबंध के तहत पूरी की गई सेवाओं के बदले देय भुगतान की जिम्मेदारी निभानी होगी। अदालत ने बकाया भुगतान के साथ छह प्रतिशत की दर से ब्याज देने का आदेश दिया। यह फैसला उन ठेकेदारों और सेवा प्रदाता फर्मों के लिए महत्वपूर्ण है, जिनका काम पूरा होने और भुगतान की देनदारी स्वीकार होने के बावजूद सरकारी संस्थानों में भुगतान लंबित रहता है।