Allahabad High Court Pending Cases: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जिला न्यायालयों में मुकदमों के लंबे समय तक लंबित रहने और जमानत आवेदनों के निस्तारण में देरी पर गंभीर टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि किसी मुकदमे का 20 साल से अधिक समय तक लंबित रहना और कुछ मामलों में 40 साल तक सुनवाई पूरी न होना न्याय व्यवस्था के लिए शुभ संकेत नहीं है। कोर्ट ने संबंधित जिला न्यायालयों से लंबित मामलों की रिपोर्ट तलब करते हुए समयबद्ध निस्तारण सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं।
हाईकोर्ट के समक्ष रखे गए मामलों में प्रयागराज के नैनी थाने से जुड़ा वर्ष 2009 का आपराधिक मामला भी शामिल है। इसमें 16 साल के दौरान 178 से अधिक तारीखें पड़ चुकी हैं, लेकिन अब तक आरोप तय नहीं हुए। इसी तरह सरफराज अहमद के मामले में वर्ष 2008 में एफआईआर और 2010 में चार्जशीट दाखिल होने के बाद करीब 143 तारीखें लग चुकी हैं, लेकिन कार्यवाही आगे नहीं बढ़ सकी।
कोर्ट ने कहा कि विचाराधीन मामलों में जमानत की प्रक्रिया में अनावश्यक देरी नहीं होनी चाहिए। आदेश में बताया गया कि 12 अगस्त 2025 के बाद भी 9,775 अंतरिम जमानत और 1,56,155 नियमित जमानत आवेदन दाखिल हुए। कोर्ट ने कहा कि लंबे समय तक आरोप तय न होना और वर्षों तक मुकदमे लंबित रहना न्याय के उद्देश्य के अनुरूप नहीं है। गाजियाबाद, लखनऊ, सीतापुर, बुलंदशहर और सहारनपुर जैसे जिलों में ऐसे मामलों की स्थिति की जानकारी भी मांगी गई है।
हाईकोर्ट ने जिला न्यायालयों से लंबित मामलों की रिपोर्ट मांगी और पुराने मुकदमों के शीघ्र निस्तारण पर जोर दिया। कोर्ट ने कहा कि बार-बार तारीखें पड़ने और गवाहों के उपस्थित होने के बावजूद सुनवाई आगे न बढ़ना गंभीर स्थिति है। पुलिस की ओर से सम्मन-वारंट की तामील में लापरवाही के मामलों पर भी कार्रवाई के निर्देश दिए गए हैं। कोर्ट ने रजिस्ट्रार जनरल से पूरे रिकॉर्ड का डिजिटलीकरण सुनिश्चित करने को कहा है, ताकि लंबित मामलों की प्रभावी निगरानी हो सके।