Highlights:
मिट्टी से आकार ले रहीं मां लक्ष्मी और गणेश की प्रतिमाएं
परंपरागत कला को जीवंत रखने में जुटे प्रजापति समाज के चित्रकार
पूरे परिवार के साथ मूर्तियां बनाने में व्यस्त कारीगर
दीपावली पर घर-घर होगी प्रतिमाओं की पूजा
Lakshmi Ganesh Clay Idols For Diwali Preparations: भगवान श्रीकृष्ण की नगरी मथुरा में दीपावली के पर्व को लेकर तैयारियां शुरू हो गई हैं। दीपावली पर मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा के लिए बाजारों में मिट्टी की प्रतिमाओं की मांग को देखते हुए प्रजापति समाज के चित्रकार यानी कुम्हार मूर्तियां तैयार करने में जुट गए हैं। कारीगर अपनी पारंपरिक कला, हुनर और मेहनत से मिट्टी को सुंदर प्रतिमाओं का रूप दे रहे हैं। कोई मूर्तियों को आकार देने में व्यस्त है, तो कोई उनकी रंगाई और सजावट कर उन्हें आकर्षक बनाने में जुटा है। घरों में दीपावली की पूजा के लिए स्थापित होने वाली इन प्रतिमाओं को तैयार करने में कारीगरों के साथ उनके परिवार के सदस्य भी हाथ बंटा रहे हैं।
दीपावली हिंदू धर्म का प्रमुख त्योहार है। इस दिन मां लक्ष्मी को सुख-समृद्धि और धन-वैभव की देवी तथा भगवान गणेश को शुभता और विघ्नों को दूर करने वाले देवता के रूप में पूजने की परंपरा है। यही वजह है कि दीपावली के अवसर पर घरों, दुकानों और प्रतिष्ठानों में लक्ष्मी-गणेश की प्रतिमाएं स्थापित कर विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है। इसी धार्मिक आस्था को ध्यान में रखते हुए मथुरा के कुम्हार कई दिन पहले से ही प्रतिमाएं बनाने की तैयारियों में जुट जाते हैं।
मिट्टी की प्रतिमाएं तैयार करने का काम आसान नहीं है। इसके लिए कारीगरों को कई चरणों से गुजरना पड़ता है। सबसे पहले मिट्टी को प्रतिमा बनाने के अनुकूल तैयार किया जाता है। इसके बाद उससे मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की मूर्तियों को आकार दिया जाता है। प्रतिमाओं के सूखने और आवश्यक प्रक्रिया पूरी होने के बाद उनकी रंगाई, सजावट और बारीक कारीगरी की जाती है। मूर्तियों के चेहरे, वस्त्र, आभूषण और अन्य आकृतियों को आकर्षक बनाने के लिए चित्रकार विशेष ध्यान देते हैं।
कारीगरों की कोशिश रहती है कि प्रतिमाएं सुंदर होने के साथ लोगों की धार्मिक भावनाओं के अनुरूप भी हों। छोटी से लेकर बड़ी प्रतिमाओं तक, हर आकार में कलात्मकता और बारीकी का ध्यान रखा जाता है। मिट्टी से बनी इन प्रतिमाओं में स्थानीय कारीगरों की वर्षों पुरानी कला और अनुभव की झलक दिखाई देती है।
दीपावली का त्योहार इन कारीगर परिवारों के लिए केवल धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व ही नहीं रखता, बल्कि उनकी आजीविका से भी जुड़ा हुआ है। त्योहार नजदीक आते ही काम बढ़ जाता है। ऐसे में मूर्तिकारों के परिवार के सदस्य भी प्रतिमाएं तैयार करने में सहयोग करते हैं। परिवार के लोग मिट्टी को आकार देने, प्रतिमाओं को व्यवस्थित करने, रंगाई करने और सजावट जैसे कामों में हाथ बंटाते हैं।
परिवार के सभी सदस्यों की मेहनत से बड़ी संख्या में प्रतिमाएं तैयार हो पाती हैं। दीपावली के दौरान होने वाली बिक्री से मिलने वाली आय इन परिवारों के घरेलू खर्च और रोजगार का महत्वपूर्ण सहारा बनती है। कारीगरों को उम्मीद रहती है कि त्योहार के अवसर पर लोग मिट्टी की प्रतिमाओं को खरीदेंगे, जिससे उनकी मेहनत का उचित मूल्य मिल सकेगा।
आधुनिकता के इस दौर में बाजार में पूजा की अनेक प्रकार की प्रतिमाएं उपलब्ध हैं, लेकिन मिट्टी की मूर्तियों का अपना अलग महत्व है। इन प्रतिमाओं के निर्माण से प्रजापति समाज के कारीगर अपनी पारंपरिक कला को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास कर रहे हैं। यह हुनर केवल रोजगार का माध्यम नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा भी है।
मथुरा जैसे धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व वाले शहर में मिट्टी की लक्ष्मी-गणेश प्रतिमाओं का निर्माण ब्रज की परंपराओं से भी जुड़ा हुआ है। कारीगरों की मेहनत से तैयार ये प्रतिमाएं दीपावली पर अनेक घरों में आस्था का केंद्र बनती हैं। मिट्टी को सुंदर स्वरूप देने वाले इन कलाकारों के लिए त्योहार उनकी कला प्रदर्शित करने और परिवार की आजीविका चलाने का अवसर लेकर आता है।
दीपावली के नजदीक आने के साथ ही प्रतिमाओं को तैयार करने का काम और तेज होने की उम्मीद है। अब कारीगरों को इंतजार है कि उनकी मेहनत से तैयार मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की प्रतिमाएं बाजारों तक पहुंचें और लोग इन्हें खरीदकर श्रद्धा के साथ अपने घरों में स्थापित करें। इस तरह दीपावली का पर्व धार्मिक आस्था के साथ-साथ स्थानीय हस्तकला और पारंपरिक कारीगरों की मेहनत को भी सम्मान देने का अवसर बन रहा है।