कानपुर में दीपक बनाते हुए व्यक्ति (सोर्स- नवभारत लाइव)
कानपुर

Diwali: 70 पैसे का दीया बेच रोशनी बांट रहे कुम्हार, खुद का घर अंधेरे में, बोले- 20 साल से नहीं बढ़े दाम

Diwali Earthen Diyas: कानपुर में संतोष प्रजापति ने बताया कि पिछले 50 वर्षों से मिट्टी के दीपक बनाने का काम कर रहे है। लेकिन दाम पिछले 20 साल से नहीं बढ़े। 1000 दिया महज 700 रुपये में बिके।

अभिनव श्रीवास्तव, रवनेश विश्‍वकर्मा

Highlights:

  • एक हजार मिट्टी के दीपक महज 700 रुपये में बिक रहे

  • सरकार से दीपकों का मूल्य निर्धारित करने की मांग की

  • पात्र कुम्हारों को योजनाओं की जानकारी नहीं मिल रही

Potter Problems: दीपावली को दीपों का त्योहार कहा जाता है। बिना दीपों के दीपावली अधूरी लगती है। लेकिन इन दीपों को बनाने वाले कुम्हारों की जिंदगी आज भी अंधेरे में है। महंगाई लगातार बढ़ रही है और बाजार में सजावट के लिए कई नए विकल्प आ गए हैं, लेकिन मिट्टी के दीपक बनाने वाले कुम्हारों की आमदनी में कोई बदलाव नहीं हुआ है।

सरकार इनके रोजगार और जीवन स्तर को बेहतर बनाने के लिए योजनाएं तो चला रही है, लेकिन पात्र लोगों तक इनका लाभ नहीं पहुंच पा रहा है।

20 साल से नहीं बढ़े दाम, 70 पैसे में बिक रहा एक दीपक

वर्तमान समय में दीपावली पर लोग मिट्टी के दीपकों से ज्यादा सजावट के नए विकल्पों पर ध्यान दे रहे हैं। बाजार में इलेक्ट्रॉनिक दीपक, पानी से जलने वाले दीपक, बैटरी वाले दीपक और चीनी मिट्टी से बने डिजाइनर दीपक उपलब्ध हैं। इसके बावजूद मिट्टी के दीपक जलाने की परंपरा आज भी कायम है। हालांकि, इन दीपकों को बनाने वाले कुम्हारों की जिंदगी में कोई खास बदलाव नहीं आया है।

दीपकों के स्वरूप और बाजार में कई बदलाव हुए, लेकिन इन्हें बनाने वाले कुम्हारों की आर्थिक स्थिति जस की तस बनी हुई है। जमीनी हकीकत जानने के लिए जब कुम्हारों से बातचीत की गई तो संतोष प्रजापति ने बताया कि उनका परिवार पिछले 50 वर्षों से मिट्टी के दीपक बनाने का काम कर रहा है। लेकिन दीपकों के दाम पिछले 20 वर्षों से नहीं बढ़े हैं।

उन्होंने बताया कि वर्तमान में थोक बाजार में एक हजार दीपक 700 रुपये में बिकते हैं। यानी एक दीपक की कीमत महज 70 पैसे है। इस कीमत में मिट्टी, दीपक बनाने की मेहनत और चाक चलाने के लिए इस्तेमाल होने वाली बिजली का खर्च भी शामिल है। ऐसे में 70 पैसे में दीपक बेचकर कुम्हार अपने परिवार का जीवन यापन कैसे कर पाएंगे।

संतोष प्रजापति ने सरकार से मिट्टी के दीपकों का मूल्य निर्धारित करने की मांग की है। उनका कहना है कि थोक बाजार में एक दीपक की कीमत कम से कम दो रुपये तय की जानी चाहिए। तभी कुम्हारों को उनकी मेहनत का उचित मूल्य मिल सकेगा।

उन्होंने कहा कि दिपावली पर महंगाई के कारण हर चीज के दाम बढ़ चुके हैं, लेकिन मिट्टी के दीपकों की कीमत आज भी 20 साल पुरानी है। दीपावली के दौरान दीपक बनाकर कुछ कमाई हो जाती है। बाकी पूरे साल कुल्हड़ और कलश बनाकर परिवार का खर्च चलाना पड़ता है। बारिश के मौसम में तो काम पूरी तरह ठप हो जाता है।

सरकारी योजनाएं चल रहीं, लेकिन पात्र लाभ से वंचित

उत्तर प्रदेश सरकार कुम्हारों के जीवन स्तर को सुधारने और उनके रोजगार को बढ़ावा देने के लिए कई सरकारी योजनाएं चला रही है। इसके बावजूद इन योजनाओं का लाभ जरूरतमंद कुम्हारों तक नहीं पहुंच पा रहा है।

कुम्हारों की समस्या यह है कि कई पात्र लोगों को सरकारी योजनाओं की जानकारी तक नहीं मिल पाती। विभाग की ओर से न तो पर्याप्त जागरूकता अभियान चलाए जाते हैं और न ही योजनाओं की जानकारी सार्वजनिक रूप से उन लोगों तक पहुंचाई जाती है, जिन्हें इनकी जरूरत है।

सरकार कुम्हारों के विकास के लिए योजनाएं तो बना रही है, लेकिन संबंधित विभाग के अधिकारी इन योजनाओं को धरातल पर पहुंचाने में पीछे नजर आ रहे हैं। इसका नतीजा यह है कि पात्र होने के बावजूद कई कुम्हार सरकारी सहायता से वंचित रह जाते हैं।

ऐसे में जरूरत है कि सरकारी योजनाओं की जानकारी सीधे कुम्हारों तक पहुंचाई जाए और उन्हें इनका लाभ दिलाने के लिए जागरूकता अभियान चलाए जाएं, ताकि दीपावली पर दूसरों के घरों को रोशन करने वाले कुम्हारों के जीवन में भी उजाला आ सके।

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