धर्मेंद्र कश्यप के सपा में जाने से बरेली की राजनीति में नए सियासी समीकरणों की चर्चा तेज।
धर्मपाल सिंह के राज्यसभा पहुंचने के बाद आंवला सीट पर भाजपा को नए प्रत्याशी की तलाश।
बिथरीचैनपुर, कैंट और फरीदपुर में बदलते समीकरणों के बीच भाजपा की चुनावी रणनीति पर नजर।
Bareilly Political Dynamics: आगामी विधानसभा चुनाव में भाजपा के सामने बरेली जिले में अपनी राजनीतिक पकड़ बनाए रखने के साथ कमजोर सीटों पर वापसी करने की चुनौती होगी। पूर्व सांसद धर्मेंद्र कश्यप के भाजपा छोड़कर सपा में शामिल होने से जिले में नए सियासी समीकरणों को लेकर चर्चा तेज हो गई है।
आंवला से पांच बार विधायक रहे कैबिनेट मंत्री धर्मपाल सिंह के राज्यसभा पहुंचने के बाद इस सीट पर नए प्रत्याशी की तलाश भी भाजपा के लिए अहम होगी। ऐसे में पार्टी को पिछले चुनाव के नतीजों, जातीय समीकरणों और बदले राजनीतिक हालात को ध्यान में रखकर रणनीति बनानी होगी।
बरेली जिले की नौ विधानसभा सीटों पर पिछले चुनाव के नतीजे भाजपा के लिए कई संकेत छोड़ गए थे। भोजीपुरा और बहेड़ी सीटों पर BJP को हार का सामना करना पड़ा था, जबकि कैंट सीट पर जीत का अंतर महज 768 वोट रहा था। फरीदपुर में भी जीत का अंतर करीब तीन हजार वोट था।
इन नतीजों के बाद भाजपा के सामने हारी हुई सीटों पर वापसी करने और कम अंतर से जीती सीटों पर अपनी स्थिति मजबूत करने की चुनौती थी। अब धर्मेंद्र कश्यप के सपा में शामिल होने के बाद जिले के कुछ अन्य सीटों पर भी समीकरण बदल सकते हैं।
धर्मपाल सिंह के राज्यसभा पहुंचने के बाद आंवला विधानसभा सीट पर भाजपा को नया प्रत्याशी चुनना होगा। धर्मपाल सिंह लंबे समय से इस क्षेत्र की राजनीति का प्रमुख चेहरा रहे हैं। ऐसे में उनके स्थान पर पार्टी किसे मौका देती है और नया प्रत्याशी स्थानीय स्तर पर किस तरह अपनी जगह बनाता है, यह चुनावी रणनीति का अहम हिस्सा होगा। भाजपा के लिए इस सीट पर संगठन की सक्रियता बनाए रखने के साथ स्थानीय सामाजिक समीकरणों को ध्यान में रखना भी महत्वपूर्ण होगा।
धर्मेंद्र कश्यप का प्रभाव आंवला के अलावा बिथरीचैनपुर, कैंट और फरीदपुर क्षेत्रों में भी माना जाता है। उनके सपा में शामिल होने के बाद इन इलाकों में दोनों दलों की राजनीतिक गतिविधियों पर नजर रहेगी।
धर्मेंद्र कश्यप अपनी बेटी कीर्ति कश्यप को बिथरीचैनपुर से चुनाव लड़ाने की तैयारी कर रहे हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में इस सीट पर भाजपा ने करीब 16 हजार वोटों के अंतर से जीत दर्ज की थी। आगामी चुनाव में इस सीट पर प्रत्याशी चयन और स्थानीय समीकरणों की भूमिका महत्वपूर्ण रह सकती है।
समाजवादी पार्टी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक यानी पीडीए के समीकरण को अपनी राजनीति के केंद्र में रख रही है। वहीं, भाजपा भी विभिन्न सामाजिक वर्गों के बीच अपनी पहुंच बढ़ाने के प्रयास कर रही है।
हाल में पिछड़ा वर्ग के नेताओं को राज्यसभा भेजे जाने को भी व्यापक राजनीतिक रणनीति के संदर्भ में देखा जा रहा है। हालांकि, चुनाव में स्थानीय नेताओं का प्रभाव, प्रत्याशियों की छवि और संगठन की सक्रियता जैसे कारक भी भूमिका निभा सकते हैं।
विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के बाद मतदाता सूची में हुए बदलाव भी चुनावी तैयारियों का महत्वपूर्ण पहलू होंगे। ऐसे में सभी दलों के लिए मतदाता सूची की स्थिति, बूथ स्तर पर संगठन की सक्रियता और स्थानीय मुद्दों पर काम करना जरूरी होगा।
कुल मिलाकर, बरेली जिले में भाजपा की आगामी चुनावी रणनीति में कमजोर सीटों पर संगठन मजबूत करने, आंवला में नए प्रत्याशी का चयन करने और बदलते सामाजिक व राजनीतिक समीकरणों के बीच अपनी स्थिति का आकलन करने जैसे मुद्दे अहम रहेंगे।