Highlights:
‘नन्हे फरिश्ते’ बनकर बच्चों को अपनों तक पहुंचा रही RPF
नौ महीने में 100 से अधिक बच्चों को मिलाया
मुसीबत में फंसे बच्चों की मदद के लिए चाइल्ड हेल्पलाइन 1098 पर संपर्क करें
RPF Nanhe Farishte Initiative: रेलवे की पहचान तेज रफ्तार ट्रेनों, आधुनिक स्टेशनों और बेहतर यात्री सुविधाओं से होती है। रेलवे इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत बनाने और यात्रियों की सुरक्षित यात्रा सुनिश्चित करने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव के नेतृत्व में सुविधाओं के विस्तार पर भी जोर दिया जा रहा है। लेकिन रेलवे की एक ऐसी तस्वीर भी है, जो किसी नई ट्रेन या आधुनिक स्टेशन से नहीं, बल्कि किसी बच्चे के चेहरे पर लौटने वाली मुस्कान से जुड़ी है। यह तस्वीर है उन रेलकर्मियों की, जो अपनों से बिछड़े, घर से नाराज होकर निकले या किसी कारण रेलवे स्टेशन तक पहुंच गए नाबालिग बच्चों के लिए मददगार बनते हैं।
रेलवे प्रोटेक्शन फोर्स (RPF) की ‘नन्हे फरिश्ते’ पहल इसी मानवीय जिम्मेदारी की मिसाल है। वर्दी पहने जवानों से लेकर टिकट जांच करने वाले टीटी और टीटीई सहित रेलवे के दूसरे कर्मचारी भी ऐसे बच्चों की पहचान करने और उन्हें सुरक्षित सहायता दिलाने में अहम भूमिका निभाते हैं। कई बार घर में किसी बात पर नाराज होकर निकला बच्चा अनजान रास्तों पर भटक जाता है। किसी बच्चे को यह तक पता नहीं होता कि उसे कहां जाना है और किससे मदद मांगनी है। ऐसे में रेलवे स्टेशन पर तैनात कर्मचारी उसके लिए सुरक्षा और भरोसे का पहला सहारा बन सकते हैं।
रेलवे स्टेशन पर हर दिन हजारों यात्री आते-जाते हैं। भीड़ के बीच किसी अकेले, घबराए या भटके हुए बच्चे को पहचानना और उसे मदद उपलब्ध कराना संवेदनशीलता के साथ सतर्कता का भी काम है। RPF और रेलवे के दूसरे कर्मचारी ऐसे बच्चों की पहचान कर उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने तथा निर्धारित प्रक्रिया के तहत उन्हें उनके माता-पिता और परिजनों तक पहुंचाने में भूमिका निभाते हैं।
इस पहल का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है, क्योंकि घर से नाराज होकर निकले बच्चों को रास्ते में कई तरह के जोखिमों का सामना करना पड़ सकता है। समय रहते सहायता मिलने से उन्हें असुरक्षित परिस्थितियों से बचाने और परिवार से दोबारा मिलाने में मदद मिलती है। यहां रेलवे की भूमिका महज कानून-व्यवस्था बनाए रखने तक सीमित नहीं रहती, बल्कि वह एक संवेदनशील सामाजिक जिम्मेदारी भी निभाता है।
आगरा रेल मंडल में जनवरी से सितंबर तक 100 से अधिक बच्चों को उनके माता-पिता और परिजनों तक पहुंचाने का काम RPF ने किया है। यह आंकड़ा उन प्रयासों की ओर ध्यान खींचता है, जो रेलवे की रोजमर्रा की व्यस्तता के बीच बच्चों की सुरक्षा और परिवार से उनके पुनर्मिलन के लिए किए जा रहे हैं।
हर बच्चे के घर लौटने के पीछे एक अलग कहानी हो सकती है। किसी के घर से नाराज होकर निकलने की, किसी के रास्ता भटक जाने की, तो किसी के अचानक अपनों से दूर हो जाने की। ऐसे में परिवार से दोबारा मिलना सिर्फ एक बच्चे की घर वापसी नहीं, बल्कि माता-पिता की चिंता खत्म होने और परिवार में खुशियां लौटने का क्षण भी होता है।
रेलवे स्टेशनों पर भटके, खोए या संकट में मिले बच्चों की सहायता के लिए संबंधित व्यवस्था और सहायता डेस्क की भूमिका महत्वपूर्ण है। ऐसे बच्चों की मदद के लिए चाइल्ड हेल्पलाइन नंबर 1098 पर भी संपर्क किया जा सकता है। बच्चों को अकेला या असहाय देखकर अनदेखा करने के बजाय रेलवे कर्मचारियों और आम लोगों की सतर्कता उन्हें सुरक्षित सहायता तक पहुंचाने में मदद कर सकती है।
रेलवे की इस पहल का मानवीय पक्ष यही है कि उसकी जिम्मेदारी सिर्फ यात्रियों को एक स्टेशन से दूसरे स्टेशन तक पहुंचाना नहीं है। कभी-कभी इसी सफर में किसी बच्चे को उसके अपनों तक पहुंचाने का अवसर भी मिलता है। जब रेलवे की वर्दी किसी डरे हुए बच्चे के लिए भरोसे का चेहरा बनती है और उसकी घर वापसी का रास्ता तैयार होता है, तब रेल सेवा का एक ऐसा रूप सामने आता है, जिसकी अहमियत किसी सुविधा या रफ्तार से कम नहीं है।
रेलवे की पटरियों पर सफर जारी रहता है, लेकिन ‘नन्हे फरिश्तों’ की पहल कई परिवारों के जीवन में बिछड़ने की उदासी को मिलन की खुशी में बदलने का काम करती है।