Moisture Electric Generator (Source. Freepik) 
टेक्नॉलजी

हवा से बनेगी बिजली, वैज्ञानिकों की नई खोज से खत्म हो सकती है बैटरी की टेंशन, 30 दिन तक लगातार मिलती रहेगी पावर

Moisture Electric Generator: दुनियाभर में तकनीक के बढ़ने के साथ ई-वेस्ट और प्रदूषण भी बढ़ता जा रहा है, ऐसे में वैज्ञानिकों ने एक ऐसी तकनीक विकसित की है जो आने वाले समय में भविष्य की तकनीक को बदलेगा।

सिमरन सिंह

Electricity from Air Humidity: दुनियाभर में तकनीक के बढने के साथ ई-वेस्ट और प्रदूषण भी बढ़ता जा रहा है, ऐसे में वैज्ञानिकों ने एक ऐसी तकनीक विकसित की है जो आने वाले समय में इलेक्ट्रॉनिक्स की दुनिया को बदल कर रख सकती है। जैसा की आपको पता है कि अब तक बिजली बनाने के लिए बैटरी, सोलर पैनल या बड़े पावर सिस्टम का इस्तेमाल किया जाता था लेकिन नई रिसर्च बताती है कि हवा में मौजूद नमी से भी बिजली पैदा की जा सकती है। वहीं इस डिवाइज की खास बात यह है कि यह पूरी तरह बायोडिग्रेडेबल है और पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचाता।

जानकारी के लिए बता दें कि यह रिसर्च Queen Mary University of London, University of Warwick, Imperial College London और Universitas Mercatorum के वैज्ञानिकों ने मिलकर की है। इस शोध को प्रतिष्ठित Nano Energy जर्नल में प्रकाशित किया गया है।

क्या है Moisture Electric Generator?

इस खास नई तकनीक को Moisture-Electric Generator यानी MEG के नाम से जाना जाता है। जैसे की देखा गया है कि सामान्य इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस नमी से खराब हो जाते हैं लेकिन इस नए सिस्टम में नमी को ही अपनी ताकत बनाया जा रहा है। वहीं इस तकनीक को जिलेटिन, साधारण नमक और एक्टिवेटेड कार्बन जैसे सस्ते और सुरक्षित पदार्थों से तैयार किया गया है। इस प्रक्रिया में दिलचस्प बात यह है कि इसकी निर्माण प्रक्रिया बेहद आसान और पानी आधारित है। जिससे एक बात तो साफ है कि बड़े पैमाने पर इसका उत्पादन कम लागत में पूरा हो सकता है। इसके अलावा वैज्ञानिक मानते है कि यह तकनीक भविष्य में छोटे गैजेट्स और स्मार्ट सेंसर के लिए बैटरी का विकल्प भी बन सकती है।

हवा और शरीर की नमी से बनती है बिजली

रिसर्च में बतायाा गया है कि यह डिवाइस हवा या इंसानी त्वचा में मौजूद नमी को सोखता है। जिस तरह से जिलेटिन और नमक का मिश्रण सूखता है और उसके अंदर खास तीन-परत वाली संरचना बन जाती है। बताया गया है कि दोबारा नमी मिलने पर आयन सक्रिय होकर मूवमेंट शुरू करते हैं और इसी प्रक्रिया से बिजली पैदा होती है। रिसर्च में इस बात को भी सामने रखा गया है कि इसका एक छोटा यूनिट करीब 1 वोल्ट बिजली 30 दिनों से ज्यादा समय तक लगातार चला सकता है। वहीं इसमें वैज्ञानिकों ने कई यूनिट्स को जोड़कर लगभग 90 वोल्ट तक बिजली पैदा की थी। जिससे LED लाइट्स और छोटे इलेक्ट्रॉनिक उपकरण आसानी से चल पा रहे थे।

हेल्थ मॉनिटरिंग में भी होगा इस्तेमाल

इस तकनीक की खास बात यह है कि यह सिर्फ बिजली उत्पादन तक सीमित नहीं है। रिसर्च में वैज्ञानिकों ने पाया है कि MEG सेंसर की तरह भी यह काम कर सकता है। देखा गया है कि इसकी पावर आउटपुट नमी के स्तर के हिसाब से बदलती है इसलिए यह इंसानी सांस और शरीर से निकलने वाली बेहद हल्की नमी को भी आसानी से पहचान लेता है। जिसको देखते हुए बताया जा रहा है कि इसका इस्तेमाल भविष्य में हेल्थ मॉनिटरिंग डिवाइस, वियरेबल टेक्नोलॉजी और टचलेस सेंसर सिस्टम में किया जा सकता है।

पर्यावरण के लिए बड़ी राहत

MEG के आने में इसकी सबसे बड़ी खासियत ही लोगों को पंसद आएगी जो इसका इको-फ्रेंडली होना है। जैसा की आपको पता है कि सामान्य इलेक्ट्रॉनिक्स में प्लास्टिक और जहरीले केमिकल्स का इस्तेमाल होता है लेकिन यह डिवाइस इस्तेमाल के बाद मिट्टी में आसानी से घुल जाता है। जिसको देखते हुए वैज्ञानिक इसे सर्कुलर इलेक्ट्रॉनिक्स की दिशा में बड़ा कदम मान रहे हैं जो भविष्य में ई-वेस्ट की समस्या को कम कर सकता है।

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