Strait of Hormuz Crisis: अमेरिका व ईरान के बीच शांति समझौता हुए कुछ सप्ताह ही बीते थे कि अमेरिका ने फिर ईरान पर मिसाइल हमला शुरू कर दिया। ट्रंप ने कहा कि हमारे लिए समझौता खत्म हो चुका है और दूसरी ओर ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान की भाषा भी युद्ध ज्वर को भड़काने वाली है। अमेरिका और ईरान के युद्ध की वजह से सऊदी अरब, यूएई, कतर आदि खाड़ी देशों को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है क्योंकि वहां पर अमेरिका के सैनिक अड्डे हैं।
अमेरिका के हमले के जवाब में ईरान इन फौजी अड्डों को निशाना बना रहा है। इसलिए खाड़ी के देश परेशान हैं और चाहते हैं कि शांति स्थापित हो जाए लेकिन ट्रंप की हठ और ईरान का स्वाभिमान देखते हुए नहीं लगता कि जल्दी कोई सुलह होगी। इस युद्ध से अस्थिरता बनी रहेगी। विश्व के तेल का 20 प्रतिशत परिवहन होर्मुज की खाड़ी से होता है।
भारत सहित एशिया के अनेक देश वहां से आनेवाले तेल पर निर्भर हैं। ईरान ने होर्मुज का उपयोग किसी शस्त्र के समान किया। ईरान ने वहां से जानेवाले 3 तेलवाही जहाजों को निशाना बनाया। इसके बाद अमेरिका ने ईरान के 6 से ज्यादा शहरों पर हवाई हमले शुरू किए, होमुंज पर नियंत्रण को लेकर दोनों में संघर्ष भड़क रहा है।
भारत ने ईरान के चाबहार बंदरगाह में जो मैरीटाइम ट्रैफिक कंट्रोल टॉवर बनाया था वह अमेरिका की बमबारी में ध्वस्त हो गया। अमेरिका ने ईरान के 90 ठिकानों को तबाह करने का दावा किया है। अमेरिका की निगाह में ईरान की परमाणु शस्त्र बनाने की कोशिश और उसकी क्षेत्रीय महत्वाकांक्षा बेहद खतरनाक है।
ईरान की जनता मासूमों की मौत के लिए अमेरिका से बदला लेना चाहती है। खामनेई की दफनविधि के दौरान यह रोष और भी तीव हो गया। युद्ध पुनः भड़कने से इजराइल को तसल्ली होगी क्योंकि वह चाहता है अमेरिका पूरी तरह ईरान को तबाह कर दे। वैश्विक बाजार पर इसका दुष्परिणाम हो रहा है।
जहाजों की आवाजाही रुकने से तेल कीमतें और बढ़ेंगी। महंगाई से अर्थव्यवस्था प्रभावित होगी। शांति समझौता इसलिए भी टूटा क्योंकि इजराइल ने हिजबुल्लाह को खत्म करने के नाम पर लेबनान पर हमले जारी रखे।
ईरान चाहता था कि इजराइल बैरूत को निशाना न बनाए, ऐसी स्थिति में किसी निष्पक्ष व प्रभावशाली बिचौलिए के आगे आना होगा जो अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम कराए तथा ईरान से समुद्री व्यापार सुचारू रखने के लिए नियमों का पालन करने को कहे। बैंक चैनल डिप्लोमेसी जारी रखी जाए, दोनों देशों के अतिवादी अपना हठीला रवैया छोड़ें।
युद्ध भड़कने से किसी का फायदा न होकर दोनों पक्षों को नुकसान होता है। अमेरिका भी समझ गया है कि ईरान को वेनेजुएला के समान दबाया नहीं जा सकता। अपना वरिष्ठ नेतृत्व नष्ट होने पर भी ईरान ने हार नहीं मानी। इस युद्ध का दुष्परिणाम अन्य देशों को भी महंगाई व आर्थिक आघात के रूप में भुगतना पड़ रहा है।
लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा