पिछले एक दशक से ध्यान में आया है कि किस तरह मनमाने और निरंकुश ढंग से ईडी अधिकारी व्यवहार कर रहे हैं और राजनीतिक दबावतंत्र की कठपुतली बने हुए हैं। उनका खौफ इतना बढ़ गया कि ईडी का नाम सुनते ही कारपोरेट जगत और विपक्षी राजनेताओं की नींद हराम हो जाती थी। विदेश से आनेवाले काले धन की देश की अर्थव्यवस्था में मिलावट न हो और इसे नियंत्रित किया जा सके, इस उद्देश्य से कांग्रेस के शासनकाल में ईडी बनाई गई थी। हाल के वर्षों में देखा गया कि जिस उद्देश्य से इसे बनाया गया था, उसे छोड़कर सत्तारूढ़ दल के इशारे पर काम करनेवाली और राजनीतिक रंजिश की बहती गंगा में हाथ धोनेवाली जांच एजेंसी बनकर रह गई। ईडी का एक्शन रेट तो 100 फीसदी है लेकिन जब उसके कान्विक्शन रेट की बारी आती है तो वह ग्रेस मार्क से भी पास नहीं हो पा रही है।
राजनीतिक शत्रुओं को निपटाने में उपयोग
ईडी का सबसे ज्यादा उपयोग राजनीतिक शत्रुओं को निपटाने और कारपोरेट प्रतिद्वंद्विता में ‘आका’ को खुश नहीं करनेवाले लोगों को ठिकाने लगाने के लिए किया गया। ऐसे समय ईडी का इस्तेमाल उन राज्यों व नेताओं के खिलाफ किया जाता रहा जहां केंद्र में सत्तारूढ़ दल को अपना चुनावी उल्लू सीधा करना था। कुछ राजदल तो यहां तक दावा करने लगे कि उनके नेताओं के खिलाफ कार्रवाई शुरू करते ही ईडी के अधिकारी पूछताछ के नाम पर सौदेबाजी करने लगते हैं। यही वजह है कि ईडी ने जितने भी लोगों के खिलाफ केस किया है उनमें से कई ने तो दबाव में आकर पार्टी बदल ली लेकिन जिन्होंने ऐसा नहीं किया वो जेल चले गए। हैरत की बात है कि ऐसे कितने ही लोग जिन पर ईडी ने केस किया था, वह उनके पार्टी बदलते या सत्तारूढ़ गठबंधन में जाते ही नाटकीय ढंग से ठंडे बस्ते में चला गया। कुछ को अपने आकाओं के इशारे पर क्लीन चिट भी दे दी गई। सुप्रीम कोर्ट ने यह सारी कारगुजारी बारीकी से देखने के बाद अपने 2 फैसलों में एजेंसी की मनमानी पर अंकुश लगाने का काम किया है। खासकर मनीलांड्रिंग वाले मामले में जहां ईडी अपने और ‘आका’ के नाम पर मनीलांड्रिंग का केस बनाने का डर दिखाती रही है वहां आगे से ऐसा नहीं हो सकेगा। राजनीति में इसका दूरगामी प्रभाव पड़ेगा।
केजरीवाल मामले में भी झटका
ऐसा केजरीवाल के मामले में भी देखने को मिला जब दिल्ली में मतदान के पहले एजेंसी भरसक प्रयास करती देखी गई कि उन्हें सुप्रीम कोर्ट से जमानत न मिलने पाए। सुप्रीम कोर्ट द्वारा अंतरिम जमानत दिए जाने के बाद भी केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने इसे नानरूटीन जजमेंट व स्पेशल ट्रीटमेंट बताया जिसके बाद एजेंसी सक्रिय हुई और तुरंत केजरीवाल के इस भाषण को लेकर चुनौती दी यदि ‘आप’ के पक्ष में पर्याप्त वोट पड़े तो उन्हें वापस जेल जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। गृहमंत्री ने इस बयान को सुप्रीम कोर्ट की अवमानना बताया।
ईडी ने सुप्रीम कोर्ट को यहां तक उकसाने की कोशिश की कि केजरीवाल तय समय पर आत्मसमर्पण नहीं करेंगे। इस पर चुटकी लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एजेंसी 2 जून तक इंतजार करे। ऐसे ही उदाहरण एजेंसी के अधिकारियों ने पेश किए हैं जिस पर उनकी जगहंसाई हो रही है। फिर भी अपने अदृश्य आका की छत्रछाया में उसकी मनमानी निरंतर जारी है।