Pachpadra Refinery Fire Politics: देश की सर्वाधिक आधुनिक तथा जीरो प्रदूषण का तमगा प्राप्त करने के लिए तैयार पचपदरा रिफाइनरी में आग की घटना के बाद फिर से राजनीति आरंभ हो गई है। 13 वर्ष में भी अधूरी इस रिफाइनरी में प्रधानमंत्री के आने और उनके उद्घाटन के साथ ही जनसभा की तैयारियों को लेकर कम राजनीति नहीं थी कि आग लगने की घटना पर आरोप-प्रत्यारोप आरंभ हो गए हैं।
राजनैतिक दलों में इसके उद्घाटन को लेकर खबर चल रही थी कि यह ऐसे समय में हो रहा है जब भाजपा की प्रतिष्ठा का प्रश्न बने बंगाल चुनाव के लिए मतदान का दिन आ चुका है। कांग्रेस सांसद उम्मेदराम बेनीवाल भी रिफाइनरी के मामले में मुखर हैं। वे संसद में प्रश्न भी कर चुके हैं। उनके अनुसार इसके पीछे अनुभवहीन लोगों को काम दिया जाना है।
जब से इस रिफाइनरी की नींव पड़ी है, तब से ही यह राजनैतिक खेल में फंसी हुई है। पचपदरा की नींव 13 साल पहले तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के कार्यकाल में रखी गई थी। कहा गया था कि यह 37,230 करोड़ रुपए में तैयार हो जाएगी। इस बीच कोरोना ने इसकी रफ्तार रोकी।
कभी शासन बदला, तो भाजपा का कार्यकाल आया, जिसकी मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे पर भी लोगों ने यह आरोप लगाए कि वह इसे टाल रही हैं। काम धीरे-धीरे चलता रहा और यह अपनी लागत बढ़ाती हुई तकरीबन 80 हजार करोड़ के पास पहुंच गई।
यह अभी पूरी बनी नहीं है, इसके पूरी तरह से बनने में अभी दो वर्ष और लगेंगे, तब तक इसकी लागत एक लाख करोड़ भी हो सकती है। इस रिफाइनरी में आग लगने की घटना के बाद से प्रश्न पूछा जा रहा है कि 16 अप्रैल को जब यूएस बेस्ड एक्स हँडलर अरविंद ने रिफाइनरियों की सुरक्षा पर सवाल उठाया, तो उसे अनदेखा क्यों किया गया? उन्होंने लिखा था कि कोई विरोधी भू-राजनीतिक लाभ के लिए भारतीय अर्थव्यवस्था को हानि पहुंचाना चाहता है।
यह पोस्ट तब और महत्वपूर्ण होती है। जब खाड़ी में तेल की जंग परमाणु जंग जैसी खतरनाक स्थिति तक पहुंचने को है और हाल में भारत के जहाजों पर खुद मित्र देश ईरान ने गोली चलाकर उन्हें रोक दिया था। इस अग्निकांड के पीछे कारण क्या है? अभी कुछ हो दिन पहले पानीपत की रिफाइनरी में मजदूरों ने तोडफोड़ की थी और हालत नहीं संभलने पर सुरक्षाबल भी पीछे हट गए थे।
यह हड़ताल वेतन वृद्धि, काम के घंटे कम करना तथा दूसरी सुविधाओं में वृद्धि की मांग को लेकर थी। कई दिनों तक यह झगड़ा होता रहा। इसके बाद नोएडा में भी मजदूर वर्ग ने हड़ताल की और वही तोडफोड़, राजनैतिक शिकायतों के बाद लाखों की भीड़ वाली रैली क्यों रखी गई? यह बात भी पूछी जा रही है कि अगर हादसा उद्घाटन के दौरान होता तो क्या होता? भारत के दूसरे स्थानों पर पहले भी आगजनी या तोडफोड़ की घटनाएं हो चुकी हैं।
जयपुर में 2009 में भी सीतापुरा में इंडियन ऑयल डिपो में आग लगने से एक हफ्ते से अधिक तक जनता परेशान रही थी तथा कम से कम एक दर्जन लोगों की मौत हुई थी। घायलों की संख्या भी सैकड़ों में थी। मुंबई के ओएनजीसी के तट पर आग से 12 लोगों की जान 2005 में गई, तो विशाखापट्टनम रिफाइनरी में 1997 की आग सभी को याद होगी।
यहां पर 50 से अधिक लोगों की जान गई थी। हल्दिया रिफाइनरी, कायली रिफाइनरी, जामनगर रिफाइनरी की घटनाएं भी झकझोर देने वाली हुई हैं। पेट्रोकेमिकल क्षेत्र में इस तरह की घटनाएं भारत में ही नहीं दुनियाभर में होती हैं। कई बार यह परीक्षण या परिचालन के दरमियान हो जाती हैं, इसका कारण तापमान के उच्चस्तर को पार कर जाना भी हो सकता है।
पचपदरा की आग लगने की घटना और उस पर तत्काल काबू पाना यह भी कोई सरल काम नहीं था। वैसे तो इस तरह की रिफाइनरियों में सुरक्षा के लिए पूरी व्यवस्था होती है पर प्रधानमंत्री का दौरा था, इसलिए यहां पर अतिरिक्त सुरक्षा व्यवस्था रही होगी। इसमें फायर बिग्रेड से लेकर दूसरी व्यवस्थाएं शामिल हैं। यह कहना कि कोई साजिश या गलती है जल्दबाजी होगी।
अब कम से कम तीन महीने तो कुछ भी नहीं हो सकता। हां, यह जरूर है कि खाड़ी युद्ध के समय में दुनिया को भारत की ताकत दिखाने की बात कुछ दिनों के लिए टल गई है। पचपदरा यही पूछ रहा है कि आखिर 13 साल बाद उद्घाटन की घड़ी में यह अपशकुन किस कारण से हुआ है?
लेख- मनोज वाष्र्णेय के द्वारा