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महाराष्ट्र और झारखंड विधानसभा चुनाव: बेरोजगारी पर भारी कैश ट्रांसफर योजनाएं

महाराष्ट्र व झारखंड की विधानसभाओं के चुनाव हुए, जहां एक चिंताजनक ट्रेंड सामने आया। वह यह था कि पैसा बोलता है। जब सरकार की कैश ट्रांसफर योजनाएं भारी जीत सुनिश्चित कर सकती हैं, तो फिर बेरोजगारी कम करने की जरूरत कहां है?

मृणाल पाठक

नवभारत डेस्क: महाराष्ट्र और झारखंड विधानसभाओं के चुनाव में कैश ट्रांसफर योजनाओं ने मतदाताओं को आकर्षित किया। लोगों को कैश देना बेरोजगारी की भीषण अवस्था का इलाज नहीं है। झारखंड में झामुमो की जीत के पीछे है मैय्या सम्मान योजना जिसके तहत 18 से 50 वर्ष की गरीब महिलाओं को सीधे 1,000 रूपये का लाभ दिया जाता है; 40 लाख परिवारों का बिजली का बिल माफ करना जोकि लगभग 3,500 करोड़ रूपये का बैठता है; झारखंड के 40 लाख लोगों को 1,000 रूपये की पेंशन।

इन कारणों के चलते झारखंड में हर बार नई पार्टी या गठबंधन की सरकार बनने का ट्रेंड टूटा। जेएमएम के नेतृत्व वाले सत्तारूढ़ इंडिया गठबंधन ने लगातार दूसरी बार राज्य में सत्ता हासिल की और उसका प्रदर्शन इस बार पहले से बेहतर रहा। 5 साल पहले उसने कुल 81 सीटों में से 47 पर जीत दर्ज की थी, लेकिन इस बार उसे 56 सीटों पर कामयाबी मिली।

इनमें से जेएमएम को 34, कांग्रेस को 16, राजद को 4 और सीपीआई(एमएल) लिबरेशन को 2 सीटें हासिल हुईं। जहां तक अन्य राज्यों में उप-चुनावों के नतीजों की बात है तो जैसा कि होता आया है, सभी जगह वही पार्टी या गठबंधन लाभ की स्थिति में रहा जोकि संबंधित राज्य में सत्तारूढ़ है।

उत्तर प्रदेश में एनडीए ने 9 में से 7 सीटें जीतीं, शेष दो सपा की झोली में गईं। राजस्थान में 7 में से 5 सीटें बीजेपी को मिलीं, जबकि कांग्रेस व बीएपी को 1-1 सीट मिली। पंजाब में 4 में से 3 सीट आप के खाते में आयीं और चौथी सीट पर कांग्रेस विजयी रही।

झारखंड में इंडिया गठबंधन की विजय ने इस बात पर मुहर लगा दी है कि देश में हेमंत सोरेन सबसे बड़े आदिवासी नेता हैं। हाई-वोल्टेज अभियान में उन्होंने सलाखों के पीछे अपने समय को आदिवासी अस्मिता से जोड़ा। उन्होंने बीजेपी पर आरोप लगाया कि उसने धरतीपुत्र को झूठे आरोपों में जेल भेजा बल्कि राज्य के गरीबों की सेवा करने से भी रोका।

हेमंत सोरेन ने राज्य में आदिवासी व गैर-आदिवासी फाल्टलाइन को भी पाटा, इस बात पर बल देते हुए कि राज्य में सम्पूर्ण विकास की आवश्यकता है। इसलिए यह आश्चर्य नहीं है कि जब चुनाव परिणामों की घोषणा हुई तो इंडिया गठबंधन ने 29 गैर-आदिवासी सीटों पर भी जीत दर्ज की, जिनमें 9 में से 5 अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीटें भी हैं।

महाराष्ट्र में भी लुभावनी योजनाएं

इस बार महाराष्ट्र व झारखंड की विधानसभाओं के चुनाव हुए, उनमें एक चिंताजनक ट्रेंड सामने आया। वह यह था कि पैसा बोलता है। कैश काम करता है। जब सरकार की कैश ट्रांसफर योजनाएं भारी भरकम जीत सुनिश्चित कर सकती हैं, तो फिर नेताओं व पार्टियों के लिए जॉब्स क्रिएट करने व बेरोजगारी कम करने की जरूरत ही कहां है?

अब उम्मीद की जा सकती है कि सभी राजनीतिक पार्टियां कैश ट्रांसफर योजनाओं पर ही बल देंगी। दरअसल, कैश ट्रांसफर योजना तो चंद सप्ताह में ही काम कर गई। अगस्त में जेएमएम ने महिलाओं को प्रति माह 1,000 रूपये देने की घोषणा की थी।

बीजेपी ने अक्टूबर में इस समूह को 2100 रूपये देने की बात कही। सोरेन सरकार ने कहा कि वह दिसम्बर से 2500 रुपये देगी। इस प्रकार की बंदरबाट वास्तव में चिंता का विषय है, जैसा कि हर नेता जानता है। अनुभवी नेताओं ने इसके खर्च को लाल झंडी भी दिखाई- महाराष्ट्र में ‘लाड़की बहना’ का बजट 46 हजार करोड़ रूपये है 2।4 करोड़ महिलाओं के लिए, जिसमें वृद्धि ही होगी, जब उसे 2100 रूपये प्रति माह कर दिया जायेगा।

जॉब पैदा नहीं करना चाहते

यह पैसा कहां से आयेगा? यह चुनौती का केवल एक हिस्सा है। अर्थव्यवस्था पर इसका गहरा व स्थायी प्रभाव पड़ेगा। जॉबलेस ग्रोथ और जीडीपी पिछले 15 साल से एक ही जगह रुकी हुई है। यह सिर्फ आधी तस्वीर है। आधी न दिखायी देने वाली तस्वीर बेरोजगार कार्यबल है जो प्रति वर्ष 7-8 मिलियन से बढ़ रहा है।

राजनीतिक दलों ने लोगों की नब्ज पकड़ी हुई है, उनके घोषणा पत्र आय संकट का उल्लेख तो करते हैं, लेकिन सरकारें जॉब अवसर उत्पन्न करने में नाकाम रहती हैं क्योंकि कैश हैंडआउट से काम चल रहा है। यह चुनावी जीत का अच्छा फार्मूला है, लेकिन मध्य व निम्न मध्यवर्ग ऐसे जाल में फंसते जा रहे हैं, जहां उनके लिए कोई आय सुरक्षा नहीं है।

लेख- डॉ. अनिता राठौर द्वारा

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