ISRO Talent Brain Drain: जिस संस्थान में 14600 से ज्यादा कर्मचारी हों, वहां 100 या इससे कुछ ज्यादा वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और परियोजना विशेषज्ञों का इस्तीफा देना या स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले लेना, कोई बहुत बड़े आचर्य की बात नहीं है। सवाल सिर्फ संख्याभर का नहीं है बल्कि उन वैज्ञानिकों के अनुभवों और विशेषज्ञताओं का है, जो अचानक इसरो छोड़कर चले गए हैं।
भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम राष्ट्रीय आत्मविश्वास, सामरिक क्षमता और तकनीकी आत्मनिर्भरता के साथ-साथ हमारे एक महाशक्ति के रूप में उभरने का प्रतीक भी है। भारत के आज कई अंतरिक्ष कार्यक्रमों की वजह से पूरी दुनिया में हमारी इज्जत बढ़ गई है।
ऐसे कार्यक्रमों में चंद्रयान, मंगलयान, आदित्य-एल 1 और गगनयान जैसी महत्वाकांक्षी परियोजनाएं हैं। इन्हीं के जरिये भारत आज वैश्विक अंतरिक्ष मानचित्र पर एक प्रभावशाली शक्ति के रूप में स्थापित है, ऐसे समय में यदि इसरो के 100 से अधिक वैज्ञानिकों के इस्तीफे या समय से पहले स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति की खबरें आती हैं, तो कान तो खड़े होते ही हैं।
आज दुनिया के सबसे सम्पन्न देशों के बीच प्रतिस्पर्धा का क्षेत्र बेहद व्यापक हो गया है। विकसित देश कभी नहीं चाहते कि कोई दूसरा देश भी विकसित बने इसलिए ये देश दूसरे देशों के श्रेष्ठ वैज्ञानिकों, प्रतिभाशाली इंजीनियरों को बेहतर वेतन, अत्याधुनिक सुविधाओं के चलते अपनी ओर खींचते रहते हैं। सामान्य भाषा में इसे 'ब्रेन ड्रेन' कहते हैं। 2007 में लगभग 53 फीसदी से ज्यादा इसरो के महत्त्वपूर्ण वैज्ञानिकों ने किसी न किसी वजह से इसरो छोड़ दिया था।
उस समय इसरो के वैज्ञानिकों और सहायक वैज्ञानिकों की कुल मिलाकर संख्या 1000 से कुछ ज्यादा थी। बाद में तत्कालीन केंद्र सरकार ने इस पर व्यापक रूप से सोचा और इसरो के वैज्ञानिकों के वेतनमान को आकर्षक बनाया। जिसके बाद वैज्ञानिक मेधाओं का पलायन रुक गया था और यही कारण है कि आज नासा के पास वैज्ञानिक प्रतिभाओं का काफी अच्छा समूह है।
बाकी दुनिया की दूसरी एजेंसियों के पास इसरो जैसा प्रतिभाओं का आधार शायद ही हो। ऐसे में 100 से ज्यादा वैज्ञानिकों और परियोजना विशेषज्ञों की इसरो छोड़ने की खबर आना साधारण नहीं है। इसके कई कारण हो सकते हैं। भारत में तेजी से विकसित हो रहा प्राइवेट अंतरिक्ष उद्योग है। स्काईरूट एयरोस्पेस, अग्निकुल कॉसमॉस, पिक्सेल, दिगंतरा जैसी निजी स्पेस कंपनियों ने हाल के दिनों में अपनी तकनीक के जरिये अंतरिक्ष जगत का ध्यान खींचा है।
तमाम नई कंपनियों ने इसरो में प्रशिक्षित वैज्ञानिकों को वहां के मुकाबले कहीं अधिक वेतन, बेहतर सुविधाएं, कंपनी के शेयरों में हिस्सेदारी तथा तेज निर्णय लेने के वातावरण का प्रलोभन देकर अपनी तरफ खींचने की कोशिश कर रहे हैं।
केंद्र सरकार को चाहिए कि वह इसरो के प्रतिभाशाली और अनुभवी वैज्ञानिकों को हर हालत में इसरो में बनाये रखने के लिए आर्थिक और प्रभाव के स्तर पर जो कुछ करना हो करे, जिससे वो देशी-विदेशी निजी क्षेत्र की कंपनियों या अन्य देशों के अंतरिक्ष प्रोजेक्ट की आकर्षित न हों।
महत्वपूर्ण प्रतिभाओं को बचाना जरूरी है। सरकारी क्षेत्र में नौकरशाही के रवैये के कारण हमारा हर काम धीमा होता है। इसरो के कई वैज्ञानिकों को शिकायत है कि उनका कॅरियर इसरो में रहते हुए उतना तेजी से आगे नहीं बढ़ पाता, जितना तेजी से बढ़ना चाहिए।
इसलिए सरकार को इस नजरिये से भी, इस तरह के पलायन को देखना चाहिए और ऐसी सारी वजहों को बंद कर देना चाहिए, जो दूसरे क्षेत्रों द्वारा कुछ बेहतर का लालच देकर इन परिस्थितियों को पैदा करें। भारत सरकार द्वारा इस घटना को बेहद संजीदगी से लेना चाहिए।
भारत के आज कई अंतरिक्ष कार्यक्रमों की वजह से पूरी दुनिया में हमारी इज्जत बढ़ गई है। ऐसे कार्यक्रमों में चंद्रयान, मंगलयान, आदित्य-एल। और गगनवान जैसी महत्वाकांक्षी परियोजनाएं हैं। इन्हीं के जरिये भारत आज वैश्विक अंतरिक्ष मानचित्र पर एक प्रभावशाली शक्ति के रूप में स्थापित है। ऐसे समय में यदि इसरो के 100 से अधिक वैज्ञानिकों के इस्तीफे या समय से पहले स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति की खबरें आती हैं, तो कान तो खड़े होते ही हैं।
-लेख-लोकमित्र गौतम के द्वारा