इंदौर में प्रधान आरक्षक फिरोज खान के ठिकानों पर आय से अधिक संपत्ति मामले में लोकायुक्त की छापेमारी।
शुरुआती जांच में संपत्तियों का बाजार मूल्य करीब 29.73 करोड़ रुपये आंका गया।
कथित फर्जी फर्मों, बैंक खातों और संदिग्ध जमीन सौदों की जांच की जरूरत।
दोष सिद्ध होने पर कार्रवाई और निगरानी में लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों की जवाबदेही तय करने पर जोर।
Indore Police Constable Disproportionate Assets Case: भ्रष्टाचार किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए दीमक की तरह है। यह न केवल सरकारी व्यवस्था की विश्वसनीयता को कमजोर करता है, बल्कि आम नागरिक के उस भरोसे को भी चोट पहुंचाता है, जिसके आधार पर वह शासन और प्रशासन से न्याय की अपेक्षा करता है। जब कानून लागू कराने की जिम्मेदारी संभालने वाले ही कानून को ठेंगा दिखाने लगें, तव व्यवस्था की खामियों पर गंभीरता से विचार करना जरूरी हो जाता है।
इंदौर पुलिस प्रशिक्षण महाविद्यालय में पदस्थ प्रधान आरक्षक (चालक) फिरोज खान के ठिकानों पर लोकायुक्त की कार्रवाई इसी लिहाज से चिंताजनक है। आय से अधिक संपत्ति की शिकायत पर हुई छापेमारी में करोड़ों रुपये की संपत्ति, कई बैंक खातों, वाहनों और कथित फर्जी फर्मों से जुड़े दस्तावेज सामने आने की जानकारी मिली है। शुरुआती जांच के अनुसार, संपत्तियों का वर्तमान बाजार मूल्य करीब 29.73 करोड़ रुपये आंका गया है, जबकि इन्हें खरीदने में लगभग 11.57 करोड़ रुपये खर्च किए गए थे।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि सरकारी सेवा में रहते हुए कोई कर्मचारी कथित तौर पर इतनी बड़ी संपत्ति कैसे जुटा सकता है? यदि किसी पुलिसकर्मी की आय और उसकी संपत्ति के बीच इतना बड़ा अंतर सामने आता है, तो सवाल केवल संबंधित व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता।
यह भी जांच का विषय बनता है कि उसकी गतिविधियों पर निगरानी रखने वाले अधिकारी क्या कर रहे थे? संपत्ति अर्जित करने के लिए यदि फर्जी फर्मों, दूसरे व्यक्तियों के नाम और संदिग्ध जमीन सौदों का इस्तेमाल किया गया, तो संबंधित विभागों की निगरानी व्यवस्था कहां थी? सरकारी कर्मचारियों को मिलने वाला वेतन जनता के करों से आता है। इसके बदले उनसे ईमानदारी, निष्पक्षता और कानून के प्रति निष्ठा की अपेक्षा की जाती है।
पुलिस जैसे विभाग में यह जिम्मेदारी और भी महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि आम नागरिक अपनी सुरक्षा और न्याय के लिए इसी व्यवस्था पर निर्भर रहता है। यदि कानून के रखवाले ही अपने पद का दुरुपयोग करने लगें, तो आम आदमी का भरोसा किस पर टिकेगा? बहरहाल, इस मामले में लोकायुक्त की कार्रवाई स्वागत योग्य है। लेकिन छापेमारी और संपत्ति का खुलासा ही पर्याप्त नहीं है।
जांच को तार्किक परिणति तक पहुंचाना, संपत्तियों के वास्तविक स्रोत का पता लगाना, संदिग्ध लेन-देन की पड़ताल करना और दोष सिद्ध होने पर कानून के अनुसार कठोर कार्रवाई करना आवश्यक है। यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि किसी कर्मचारी की संदिग्ध गतिविधियों की जानकारी सामने आने पर विभागीय स्तर पर समय रहते कार्रवाई हो। जिन अधिकारियों ने निगरानी में लापरवाही की हो या किसी तरह की मिलीभगत की हो, उनकी भूमिका की भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा