India Iran Israel Diplomacy: पश्चिम एशिया से हमारे हित जुड़े हुए हैं। लगभग 1 करोड़ भारतीय खाडी देशों, इजराइल व ईरान में कार्यरत हैं। इसके अलावा प्रधानमंत्री मोदी के अमेरिका, ईरान, इजराइल तथा खाड़ी देशों से मैत्रिपूर्ण संबंध हैं।
इसे देखते हुए फिनलैंड के राष्ट्रपति ने राय दी है कि मोदी को अमेरिका व इजराइल विरुद्ध इंरान जंग को समाप्त कर शांति स्थापना के लिए मध्यस्थता करनी चाहिए, भारत ने अंतरराष्ट्रीय संबंधों का सही दिशा में विस्तार कर खाड़ी देशों ही नहीं, इजराइल के साथ भी रिश्तों को ऊंचाई पर पहुंचाया है।
इस युद्ध के बावजूद भारत ने ईरान के साथ अपने संबंधों को कमजोर होने नहीं दिया है। यदि प्रत्यक्ष रूप से नहीं तो बैंक चैनल डिप्लोमेसी के जरिए भारत मध्यस्थता की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास कर सकता है।
कतर के अमीर और ओमान के सुलतान से प्रधानमंत्री मोदी के व्यक्तिगत संबंध काफी अच्छे हैं। पश्चिम एशिया के देशों के साथ भारत के व्यापार संबंध हैं तो इजराइल के साथ भी रक्षा तकनीक व कृषि क्षेत्र में समझौता है।
इसके बावजूद अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप का स्वभाव देखते हुए उन्हें संघर्ष विराम के लिए राजी कर पाना चुनौतीपूर्ण होगा। भारत की कूटनीतिक ताकत को विश्व अच्छी तरह जानता है।
अनेक देश चाहेंगे कि कीमती संसाधनों की बरबादी करनेवाले इस विनाशकारी युद्ध को रोकने के लिए कोई तो बीचबचाव करे। विश्वशांति की दिशा में भारत की पहल का समूचा विश्व स्वागत करेगा।
भारत यदि चीन, रूस, ब्राजील व द। अफ्रीका के साथ ब्रिक्स समूह में शामिल है तो अमेरिका आस्ट्रेलिया व जापान के साथ 'क्वाड' का सदस्य भी है। इतने पर भी मध्यस्थता करने की तभी सोचना चाहिए जब युद्ध से जुड़े हुए देश इसके लिए अनुरोध करें।
ट्रंप के सनकी व आक्रामक स्वभाव तथा ईरान की बौखलाहट को देखते हुए बहुत विचारपूर्वक कदम उठाना होगा। भारत चाहेगा कि युद्ध शीघ्र समाप्त हो क्योंकि ऊर्जा संकट बुरी तरह महरा रहा है व्यापार चौपट हो रहा है।
प्रवासी भारतीय युद्ध क्षेत्र में फंसे हुए हैं। रुपए और शेयरबाजार पर विपरीत असर पड़ा है। विपक्ष सवाल उठाता है कि पश्चिम एशिया युद्ध को लेकर मोदी मौन क्यों हैं? यहां देशहित का मुद्दा आता है।
यदि ट्रंप की आलोचना की तो वह टैरिफ बढ़ा देंगे और अमेरिका से हमारे रणनीतिक संबंध प्रभावित होंगे, सभी जानते हैं कि ट्रंप अंतरराष्ट्रीय कानून को तरजीह नहीं देते और अपनी मर्जी से चलते हैं।
चीन पर दबाव बनाए रखने के लिए अमेरिका से रक्षा सहयोग व तकनीकी भागीदारी जरूरी है। भारत किसी एक पक्ष का साथ नहीं दे सकता। वह सभी के साथ संबंध रखता है।
इजराइल व ईरान दोनों से रिश्ते रखना भारतीय कूटनीति की सफलता है। भारत ने रूस-यूक्रेन युद्ध में भी किसी का पक्ष नहीं लिया लेकिन शांति स्थापना की बात हमेशा कही है।
लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा