प्रतीकात्मक तस्वीर ( सोर्स: सोशल मीडिया ) 
नवभारत विशेष

नवभारत संपादकीय: निवृत्ति के 20 साल बाद तक, किताब लिखने पर रोक

Army Memoir Ban: पूर्व सेना प्रमुख की किताब से उठे विवाद के बाद सरकार फौजी अफसरों की लेखनी पर रोक की तैयारी में है। प्रस्तावित 20 साल का कूलिंग पीरियड अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सवाल खड़े करता है।

अंकिता पटेल

Military Book Cooling Period: कहावत है- दूध का जला छाछ भी फूंक-फूंक कर पीता है। पूर्व आर्मी चीफ जनरल मनोज मुकुंद नरवणे की अप्रकाशित पुस्तक 'फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी' को लेकर संसद में जो राजनीतिक तूफान उठा, उसके बाद सरकार सतर्क हो गई।

अब वह फौजी अफसरों के किताब लिखने पर अपने तरीके से रोक लगाने पर विचार कर रही है। इसके मुताबिक गर्म खून के फौजी अधिकारी को रिटायरमेंट के बाद अपना दिमाग ठंडा करने के लिए 20 वर्ष का समय दिया जाएगा।

इस कूलिंग ऑफ पीरियड के दौरान उसे किताब लिखने की अनुमति नहीं होगी। न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी। निवृत्ति के बाद वह 20 साल जिंदा रहेगा या नहीं? जीवित रहा तो किताब लिखने का उत्साह व जोश समाप्त हो जाएगा, स्मरण शक्ति भी जवाब दे जाएगी, किताब में जिन लोगों का संदर्भ या उल्लेख होगा, वे भी भुला दिए जाएंगे या चल बसेंगे, कूलिंग ऑफ पीरियड के दौरान अधिकारी के दिमाग को जंग लग जाएगी। उससे सरकार कहेगी फौजी का काम राइफल, मशीन गन, तोप चलाना रहता है।

अब गोली मार किताब लिखने की योजना को। दो पेग पी और आराम फरमा। गन चलाने वाले को कलम चलाने की क्या जरूरत। पेंशन ले, किताब लिखने का टेंशन मत ले। जिस सरकार ने तुझे ऊंचे पद दिए, उनकी पोल पट्टी खोलने की सोच भी मत। अफसर को समझाया जाएगा- किताब तुम लिखोगे और उसकी कॉपी लेकर विपक्ष का नेता सरकार कीफजीहत करेगा। वह आरोप लगाएगा कि सरकार ने अधिकारी को स्पष्ट निर्देश नहीं दिए। कह दिया जो ठीक समझो, वह करो।

इससे लोगों को लगेगा कि सरकार खुद निर्णय नहीं ले पाती। जनरल पर जिम्मेदारी डाल देती है। कुछ गलत हो जाए तो वह फंसे। इसलिए सबसे अच्छा तरीका है कि फौजी रिटायर होने के बाद न कलम चलाए, न कंप्यूटर।

कूलिंग ऑफ पीरियड में 20 साल इंतजार करे, तब तक या तो वह ठंडा हो जाएगा या फिर उनका किताब लिखने का जुनून! ऐसा बनाया जाएगा कानून! सरकारी सेवा में रहे अन्य अधिकारियों पर भी ऐसा ही प्रतिबंध लगाया जा सकता है।

20 वर्ष के कूलिंग ऑफ पीरियड में उनसे दिमाग को आराम देने के लिए कहा जाएगा जिसमें वह अपने सेवाकाल से जुड़ी बातें नहीं लिख सकेंगे, यदि सरकार किसी लेखन से इतनी आशंकित है तो फौज या सरकारी नौकरी में भर्ती के समय ही प्रत्याशी से पूछ लेना चाहिए कि वह लेखक तो नहीं है।

निवृत्ति के बाद भी उसे लेखन की प्रवृत्ति दबाकर रखनी होगी। वह अपनी बची हुई जिंदगी के हिसाब में समय गुजार दे लेकिन किताब भूलकर भी न लिखे। वैसे भी स्मार्टफोन के जमाने में लोगों ने किताब पढ़ना छोड़ दिया है। किताब सिर्फ संसद में हल्ला बोलने के काम आती है।

लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा

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