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चुनावी व्यवस्था में सुधार कैसे हो

नवभारत डेस्क

भारत की चुनावी और राजनीतिक व्यवस्था में सुधार तत्काल और अत्यंत आवश्यक है. सबसे पहले तो कम से कम 34 प्रतिशत निचले सदन के सदस्यों द्वारा हस्ताक्षरित नामांकन पर गुप्त और अनिवार्य मतदान के तहत प्रधानमंत्री व मुख्यमंत्रियों को अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के साथ-साथ चुना जाना चाहिए. राज्यसभा चुनाव के लिए गुप्त मतदान बहाल किया जाना चाहिए लेकिन वीवीपैट प्रणाली से लैस ईवीएम के माध्यम से. विधान परिषदों के प्रावधान को समाप्त करने के लिए संविधान में संशोधन किया जाना चाहिए.

जीवन में कोई चुनाव न लड़ने वालों को ही राज्यसभा का मनोनीत सदस्य नियुक्त किया जाना चाहिए. इसी तरह जिन व्यक्तियों ने अपने जीवनकाल में कोई चुनाव नहीं लड़ा हो, उन्हें ही राज्यपाल नियुक्त किया जा सकता है. किसी भी सांसद या विधायक को अपनी पार्टी या समाज में किसी भी प्रकार के किसी पद पर नहीं रहना चाहिए. निचले सदन की मंत्रिस्तरीय शक्ति को 10 प्रतिशत तक कम किया जाना चाहिए. मतदान में अपनी ‘सिक्योरिटी’ खो देने वाले व्यक्तियों को अगले 6 वर्षों तक चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित किया जाना चाहिए. जबकि ‘उपरोक्त में से कोई नहीं’ (नोटा) विकल्प को व्यावहारिक रूप से उपयोगी बनाया जाना चाहिए.

‘नोटा’ से कम वोट पाने वाले सभी उम्मीदवारों को भविष्य में कोई भी चुनाव लड़ने से रोका जा सकता है. अगर किसी सीट में नोटा जीतने की स्थिति में हो तो उसके ठीक बाद वाले प्रत्याशी को निर्वाचित घोषित किया जा सकता है. राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति का चुनाव सभी सांसदों और विधायकों द्वारा एक साथ किया जाना चाहिए, जिस तरह से राष्ट्रपति का चुनाव किया जाता है. राष्ट्रपति का पद रिक्त होने की स्थिति में उपराष्ट्रपति को शेष कार्यकाल के लिए राष्ट्रपति बनाया जा सकता है. लेकिन उपराष्ट्रपति का पद रिक्त होने की स्थिति में अंतरिम उपराष्ट्रपति का चुनाव केवल सांसदों द्वारा ही किया जा सकता है.

एक बार राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति व राज्यपाल पदों पर आसीन होने वाले व्यक्तियों को फिर जीवन में हमेशा के लिए सक्रिय राजनीति छोड़ देनी चाहिए अन्यथा पेंशन और सरकारी आवास सहित उनके सेवानिवृत्ति के बाद के सभी लाभ वापस लिए जा सकते हैं. चुनाव आयोग को संसद को एक साल का नोटिस देकर चुनाव सुधार लागू करने का अधिकार दिया जाना चाहिए. यदि संसद निर्धारित एक वर्ष के भीतर चुनाव आयोग द्वारा प्रस्तावित सुधारों को अस्वीकार नहीं करती है तो इन्हें संसद द्वारा अनुमोदित माना जाना चाहिए. इसलिए लोकपाल को सांसदों की अनुचित हरकतों पर गौर करना चाहिए. लोकसभा ने सांसद राजेश मांझी को अपनी महिला मित्र को पत्नी के रूप में सरकारी खर्चे पर विदेश यात्रा पर ले जाने पर मामूली सजा देते हुए उन्हें लोकसभा की कुछ बैठकों से रोक दिया था. सदन में 75 प्रतिशत से कम उपस्थिति वाले सांसदों और विधायकों को अगले 6 वर्षों तक कोई भी चुनाव लड़ने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए. 

- सुभाषचंद्र अग्रवाल

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