प्रतीकात्मक तस्वीर ( सोर्स: सोशल मीडिया ) 
नवभारत विशेष

नवभारत संपादकीय: सेना को सीधा व स्पष्ट निर्देश क्यों नहीं

Civil Military Leadership: मजबूत सेना के बावजूद लोकतंत्र में अंतिम जिम्मेदारी राजनीतिक नेतृत्व की होती है। आदेशों के बिना संकट में सेना के हाथ बंध जाते हैं-जनरल नरवणे की किताब यही सच्चाई उजागर करती है

अंकिता पटेल

Civil Control of Army: देश की सीमाओं की सुरक्षा में दिन-रात लगी हमारी सेना का प्रशिक्षण, क्षमता, अनुभव व हौसला बेजोड़ है और वह विश्व की सर्वश्रेष्ठ अनुशासित सेनाओं में से एक मानी जाती है। इतने पर भी हमारे लोकतांत्रिक राष्ट्र में राजनीतिक नेतृत्व और सेना की कमान संभालने वाले कमांडर के बीच स्पष्ट संवाद होना आवश्यक है।

इस लिहाज से प्रधानमंत्री या रक्षामंत्री को उचित निर्णय लेकर सेनाध्यक्ष को साफ शब्दों में नपा-तुला आदेश देना चाहिए, यह कदापि नहीं होना चाहिए कि राजनीतिक नेतृत्व अनिर्णय का बंदी बनकर रह जाए और संकट की घड़ी में स्पष्ट आदेश देने की बजाय कमांडर से कह दे कि जो उचित समझो, वह करी।

पूर्व सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे की आत्मकथा 'फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी में सेना के बंधे हाथवाली कडवी हकीकत का उल्लेख किया गया है। सेनाध्यक्ष से स्थिति की पूरी पड़ताल करने के बाद उन्हें समुचित व संतुलित आदेश देना राजनीतिक नेतृत्व की जिम्मेदारी है जिससे पीछा नहीं हटाया जाना चाहिए। भारत के पड़ोसी देशों में हमारे समान सफल लोकतंत्र नहीं रहा।

पाकिस्तान व बांग्लादेश की मिसाल सामने है। उच्च कोटि के अनुशासन वाली हमारी सेना हमेशा निर्वाचित राजनीतिक नेतृत्व के आदेशों का अनुपालन करती आई है जबकि पाकिस्तान में अयूब खान, याह्या खान, जिया उल हक व परवेज मुशर्रफ जैसे फौजी तानाशाहों ने लोकतंत्र की मट्टीपलीद की।

आज भी पाकिस्तान में फील्ड मार्शल आसिम मुनीर के पास असली पावर है जबकि प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ महज सेना की कठपुतली बनकर रह गए हैं। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के सेनाध्यक्ष जनरल चिमैया और जनरल थोराट से नीतिगत मतभेद रहे। उत्तरी मोर्चे पर चीन के खतरे को नजरअंदाज करना नेहरू को महंगा पड़ा था।

नेहरू का विश्वास था कि चीन पंचशील समझौते का पालन करते हुए भारत से मित्रता व सहयोग बनाए रखेगा। यहीं वह धोखा खा गए थे। तिब्बत पर चीन के हमले के बाद से नेहरू को सावधान हो जाना चाहिए था। चीन ने जब 1962 में नेफा में हमला किया तो हमारी सेना के पास गर्म कपड़े और बर्फ में पहने जाने वाले जूते भी नहीं थे फिर भी हमारी सेना वीरता से लड़ी।

इस अनुभव के बाद भारत ने सीख ली। 1965 के भारत-पाक युद्ध में प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री व रक्षामंत्री यशवंतराव चव्हाण के सेना को स्पष्ट निर्देश थे और वह पूरी बहादुरी से लड़ी। 1971 का बांग्लादेश युद्ध इंदिरा गांधी के राजनीतिक नेतृत्त्व की अद्भुत मिसाल था।

उन्होंने जनरल मानेकशा से मंत्रणा कर युद्ध में पाकिस्तान को घुटनों पर ला दिया था। तब 93,000 पाकिस्तानी सैनिक व अफसर युद्धबंदी बनाए गए थे। सेना तो हमेशा तत्पर रहती है लेकिन समूची स्थिति का आकलन कर सेना को आदेश देना राजनीतिक नेतृत्व का काम है कि वह लड़े या न लड़े। यदि सीमित व सटीक लक्ष्यगत कार्रवाई करनी है तो वैसा आदेश दिया जाए।

लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा

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