BRICS Summit In Delhi: दिल्ली में 12-13 सितंबर को जब दुनिया की 11 उभरती शक्तियों के नेता एक मेज पर आमने-सामने बैठेंगे, तब असली परीक्षा उस कूटनीति की होगी, जिसे भारत वर्षों से अपनी सबसे बड़ी ताकत 'रणनीतिक स्वायत्तता' बताता आया है। इस बार दांव बड़ा है। चीन के राष्ट्रपति शी जिन पिंग 7 साल बाद भारत आ रहे हैं। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन भी मौजूद होंगे और पश्चिम एशिया का युद्ध ब्रिक्स के भीतर ईरान, सऊदी अरब और यूएई के हितों को आमने-सामने ला रहा है।
दिल्ली को एक साथ चीन से संवाद करना है, रूस से साझेदारी बरकरार रखना है, पश्चिम से संबंध और वैश्विक दक्षिण का नेतृत्व यानी एक साथ चारों मोर्चे साधने होंगे। ब्रिक्स की अध्यक्षता भारत के लिए यह अवसर जितना बड़ा है, अग्निपरीक्षा भी उतनी ही कठिन है।
ब्रिक्स अब ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका तक ही नहीं सीमित। अब इसके मित्र इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और इंडोनेशिया भी पूर्ण सदस्य हैं। इसके अतिरिक्त 10 पार्टनर देश भी हैं, बेलारूस, बोलीविया, क्यूबा, कजाकिस्तान, मलेशिया, नाइजीरिया, थाइलैंड, युगांडा, उज्बेकिस्तान और वियतनाम, भारत में अपनी अध्यक्षता का आधार, 'बिल्डिंग फॉर रेजिलिएशन, इनोवेशन, को ऑपरेशन एंड सस्टेनेबिलिटी' रखा है।
पूरे साल 25 से अधिक शहरों में सम्पन्न 350 से अधिक बैठकों के बाद जब ब्रिक्स सम्मेलन आयोजित हो रहा है, पूरी दुनिया की निगाहें इसकी तरफ हैं। ऐसा होना स्वाभाविक ही है। रूस और पश्चिम के बीच लगातार टकराव जारी है और ईरान तो पश्चिम के साथ टकराव का पोस्टर बॉय ही बन चुका है। सऊदी अरब और यूएई की अपनी सुरक्षा प्राथमिकताएं हैं और दोनों के ईरान के साथ गहरे मतभेद भी हैं। फिर भी ये सब एक मंच पर जब बैठे होंगे तो उस बैठक को सार्थक बनाने में भारतीय कूटनीति को एड़ी चोटी का जोर लगाना पड़ेगा।
भारत के लिए शी जिन पिंग की मौजूदगी एक महत्वपूर्ण चुनौती भी बन गई है। 2020 के गलवान घाटी संघर्ष के बाद दोनों देशों के राजनीतिक संबंधों में गंभीर गिरावट आई थी। अब सीमा पर तनाव कम करने, रुके हुए संवाद को न सिर्फ बहाल करने बल्कि तेज करने तथा आर्थिक संबंधों को धीरे-धीरे सामान्य बनाने की कोशिशें हो रही हैं।
ब्रिक्स में चीन के साथ संवाद का मतलब विवादों को भुला देना नहीं है। भारत-चीन संबंधों में सुधार का अर्थ यह भी नहीं है कि दोनों देशों के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा समाप्त हो गई है। यदि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शी जिन पिंग की बातचीत होती है, तो उसका सबसे महत्वपूर्ण परिणाम यह सुनिश्चित करने में हो सकता है कि दोनों देशों के बीच संवाद लगातार चलता रहे। सीमा पर शांति, व्यापार में संतुलन, निवेश, तकनीक और आपूर्ति श्रृंखला जैसे मुद्दे केवल शिखर बैठकों से हल नहीं होंगे।
भारतीय कूटनीति की सबसे बड़ी परीक्षा है कि चीन से संवाद भी हो और राष्ट्रीय हितों पर स्पष्टता भी बनी रहे। इस सम्मेलन में दूसरी बड़ी परीक्षा यह होगी कि ब्रिक्स 'चीन-रूस' धुरी बनकर न रह जाए। ब्रिक्स के विस्तार के साथ ही यह एक बात लगातार चलती रहती है कि क्या यह पश्चिमी नेतृत्व वाली विश्व व्यवस्था का विकल्प बनने की तरफ बढ़ रहा है? भारत के लिए वहां भी रास्ता साफ है।
भारत की सबसे बड़ी सफलता यही है कि उसकी रणनीतिक स्वायत्तता बरकरार रहे। ब्रिक्स का मुख्य संदेश डॉलर का विरोध, पश्चिम का विरोध या किसी नए शक्ति-गुट के विवाद तक सीमित हो जाता है, तो भारत के लिए उसकी उपयोगिता घटेगी।
लेख- लोकमित्र गौतम के द्वारा