यह बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा का बड़बोलापन है या हकीकत जो उन्होंने अचानक दुस्साहसी बयान दे दिया कि पहले बीजेपी को आरएसएस की जरूरत पड़ती थी लेकिन अब बीजेपी स्वयं सक्षम हो गई है! पार्टी अब बड़ी हो गई है और स्वयं को अपने आप चलाती है। नड्डा ने कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी के समय बीजेपी छोटी पार्टी थी जिसकी सीमित पहुंच थी तब उसे चलाने में आरएसएस की आवश्यकता पड़ती थी। प्रश्न उठता है कि संघ को कम आंकने और बीजेपी को बड़ी पार्टी बताने का बयान नड्डा ने किसके इशारे पर दिया? क्या यही बात प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री शाह कह दिखाएंगे? क्या केंद्रीय जांच एजेंसियों का डर दिखाकर दलबदलुओं को साथ लेने से पार्टी बड़ी हो जाती है और उसे अपने अभिभावक संगठन की जरूरत नहीं रहती? नड्डा का बयान अपने पितृ संगठन से बगावत जैसा है जो कि 2025 में अपना शताब्दी वर्ष मनाने जा रहा है।
संघ कभी पकड़ नहीं छोड़ता
यद्यपि आरएसएस खुद को सांस्कृतिक संगठन कहता है लेकिन राजनीति में परोक्ष रूप से उसका हस्तक्षेप अवश्य रहता है। यह कहता है कि उसके स्वयंसेवक अपनी रुचि के मुताबिक किसी भी पार्टी में शामिल होने के लिए स्वतंत्र हैं लेकिन संघ की शाखा में ढल चुके स्वयंसेवक पहले जनसंघ में और बाद में बीजेपी में जाते रहे। अन्य पार्टियों के प्रति उनका झुकाव कभी नहीं रहा। आरएसएस ने अपनी विचारधारा से हटनेवाले नेताओं को कभी नहीं बख्शा। जब जनसंघ बना तो डा। रघुवीर और मौलिचंद्र शर्मा जैसे अध्यक्षों को आरएसएस ने बाहर का रास्ता दिखा दिया। मोरारजी देसाई के नेतृत्ववाली जनता पार्टी सरकार में जब मधु लिमये और राजनारायण जैसे समाजवादियों ने अटलबिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी जैसे नेताओं की दोहरी सदस्यता का मामला उठाया तो इन दोनों नेताओं ने मंत्री पद और जनता पार्टी से इस्तीफा देकर आरएसएस से अपनी सम्बद्धता कायम रखी। संघ के प्रोत्साहन से 1980 में बीजेपी का गठन हुआ। जब वाजपेयी के नेतृत्व में एनडीए सरकार बनी थी तब भी संघ अपना दबदबा बनाए हुए था। उस समय वाजपेयी की नीतियों की आलोचना करते हुए नानाजी देशमुख और दत्तोपंत ठेगड़ी जैसे संघ के नेताओं ने कड़ी चेतावनी दी थी। तब वाजपेयी को विनिवेश का निर्णय टालना पड़ा था और विनिवेश मंत्री अरुण शौरी को हटाना पड़ा था।
आडवाणी को महत्वहीन बना दिया था
लालकृष्ण आडवाणी संघ के अत्यंत प्रियपात्र थे जिन पर वह अटल से भी ज्यादा भरोसा करता था। इसके बावजूद जब आडवाणी ने खुद को सिक्यूलर दिखाने के जोश में कराची जाकर पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना की कब्र पर जाकर उनकी तारीफ की थी तो आरएसएस ने उन्हें नजरों से गिरा दिया था। वह पूरी तरह अकेले और उपेक्षित होकर रह गए थे। संघ का सख्त अनुशासन देखते हुए आडवाणी समर्थक नेता अरुण जेटली, वेंकैया नायडू, सुषमा स्वराज, शिवराजसिंह चौहान चूं तक नहीं कर पाए थे।
अन्ना को अनुभव हुआ
समाजसेवी अन्ना हजारे ने जब जनलोकपाल बिल की मांग और भ्रष्टाचार के विरोध में दिल्ली में आंदोलन किया तो उसमें संघ कार्यकर्ताओं ने भारी भीड़ जुटाई थी। अन्ना को लगा कि यह उनकी लोकप्रियता के कारण है। जब उन्होंने मुंबई में धरना दिया तो संघ ने हाथ खींच लिया और लोग बहुत कम तादाद में आए। संघ ने अन्ना को अपनी ताकत दिखा दी। जसवंत सिंह, यशवंत सिन्हा, शत्रुघ्न सिन्हा जैसे नेता इसलिए बीजेपी में सफल नहीं हो पाए क्योंकि ये संघ के बैकग्राउंड से नहीं थे। बीजेपी सिर्फ कंप्यूटर का स्क्रीन है जबकि आरएसएस मदरबोर्ड! संघ ही असली ताकत है जिसने जनसंघ, जनता पार्टी और फिर बीजेपी को खड़ा किया। वह सहयोग-समर्थन न दे तो बीजेपी कुछ नहीं कर सकती।