Daycare Child Abuse Case: अधिकांश कामकाजी अभिभावक अपने शिशुओं को किसी पालनाघर या डे-केअर सेंटर में निश्चितता से छोड़कर जाते हैं। उन्हें विश्वास रहता है कि जब वह फीस और जरूरी साधन उपलब्ध करा रहे हैं तो उनके बच्चे की समुचित देखभाल की जाएगी और उसका स्नेहपूर्वक ध्यान रखा जाएगा।
इसके विपरीत बेंगलुरू की केपजेमिनी ग्लोबल आईटी फर्म के कैम्पस में स्थित पालनाघर (क्रेच) में बच्चों के साथ अत्यंत बुरा व क्रूरतापूर्ण व्यवहार किया गया। उन्हें अनुशासित करने या डरा-धमकाकर चुप कराने के लिए वॉशरूम और वॉशिंग मशीन में बंद कर दिया गया।
यह अत्यंत अमानवीय बर्ताव था। आखिर क्रेच संचालक व कर्मचारियों के नन्हे बच्चों के साथ ऐसा दुर्व्यवहार करने की हिम्मत कैसे हुई? कोई भी माता-पिता इसे बर्दाश्त नहीं करेंगे कि उनके आंख के तारे छोटे से बच्चे से कोई जालिम इस तरह पेश आए। उनके विश्वास के साथ छल किया गया।
जब छोटे परिवार में बच्चे की देखभाल के लिए दादा-दादी या नाना-नानी न हों और पति-पत्नी दोनों काम पर जाएं तो बच्चों को पालनाघर में छोड़ना लाजमी होता है। वर्कफोर्स में महिलाओं की भागीदारी बढ़ने से अब वह होममेकर की बजाय वर्किंग लेडीज बन गईं।
ड्यूटी पर जाते समय पालनाघर में बच्चे को छोड़ना उनके लिए जरूरी हो गया। इस वर्ष प्रकाशित डालबग - यूएनडीपी अध्ययन के अनुसार भारत के सरकारी या सार्वजनिक डेकेयर सिस्टम शहरी जरूरतों के सिर्फ 5 प्रतिशत की पूर्ति करते हैं।
इसलिए निजी तौर पर चलाए जा रहे पालनाघरों में अधिकांश पालक अपने बच्चों को छोड़कर काम पर जाते हैं। लगभग 60 से 70 लाख शहरी महिलाओं को बच्चों के लिए पालनाघर की आवश्यकता है। 2047 तक 2 करोड़ से भी अधिक महिलाओं को यह जरूरत पड़ सकती है। बढ़ती महंगाई तथा जरूरतों की वजह से अधिकांश पढ़ी-लिखी महिलाएं नौकरी करती हैं।
मातृत्व लाभ (संशोधन) अधिनियम 2017 के अनुसार जिन संस्थानों में 50 से अधिक महिलाएं काम करती हैं, वहां पालनाघर की सुविधा होना जरूरी है। वास्तव में यह भी जरूरत से कम ही है। अभी जो डेकेयर सेंटर चल रहे हैं उस पर सरकार, महापालिका का नियंत्रण होना चाहिए, जांच-परख के साथ उन्हें लाइसेंस दिया जाए तथा समय-समय पर औचक निरीक्षण भी किया जाए कि बच्चों की ठीक से देखभाल हो रही है या नहीं।
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जहां लापरवाही, अस्वच्छता, बुरा व्यवहार या क्रूरता नजर आए वहां शिकायतों को गंभीरता से लेते हुए जांच व कार्रवाई की जानी चाहिए, जिन लोगों के मन में बच्चों के प्रति दया, वात्सल्य तथा अपनत्व की भावना न हो उन्हें पालनाघर चलाने की अनुमति नहीं देनी चाहिए, बच्चों की उचित देखभाल कोई उपकार नहीं, बल्कि उनका अधिकार है।
लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा