Shri Krishna and Karna Story: महाभारत के कुरुक्षेत्र युद्ध का एक ऐसा प्रसंग है, जो आज भी लोगों के मन को छू जाता है। जब युद्ध अपने अंतिम चरण में था, तब कर्ण गंभीर रूप से घायल होकर रणभूमि में मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहे थे। उसी समय अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण से कहा कि आपका दानवीर कर्ण अब असहाय अवस्था में मौत का इंतजार कर रहा है। इस पर श्रीकृष्ण ने शांत स्वर में कहा कि कर्ण को उसकी वीरता और दानवीरता के लिए युगों-युगों तक याद किया जाएगा।
श्रीकृष्ण की यह बात सुनकर अर्जुन को आश्चर्य हुआ। उन्होंने प्रश्न किया कि जो योद्धा इस हालत में पड़ा है, वह सबसे बड़ा दानवीर कैसे हो सकता है? अर्जुन के संदेह को दूर करने के लिए भगवान कृष्ण ने स्वयं कर्ण की दानशीलता को परखने का निर्णय लिया। इसके लिए उन्होंने ब्राह्मण का वेश धारण किया और युद्धभूमि में कर्ण के पास पहुंचे।
ब्राह्मण बने श्रीकृष्ण ने कर्ण को प्रणाम किया। कर्ण ने उनका आदरपूर्वक स्वागत किया और आने का कारण पूछा। इस पर ब्राह्मण ने कहा, "मैं आपसे दान मांगने आया था, लेकिन आपकी हालत देखकर अब कुछ मांगने का साहस नहीं कर पा रहा। इस अवस्था में आप क्या ही दान दे पाएंगे?" यह सुनकर कर्ण का मन विचलित हुआ, लेकिन उनका दानी स्वभाव जाग उठा।
कर्ण ने अपने चारों ओर देखा, जहां कोई धन या वस्तु नहीं थी। तभी उन्होंने पास पड़ा एक पत्थर उठाया और अपने सोने के दांत तोड़कर ब्राह्मण को दान में अर्पित कर दिए। यह दृश्य दान की उस पराकाष्ठा को दर्शाता है, जहां व्यक्ति मृत्यु के निकट भी अपने संकल्प से नहीं डिगता।
कर्ण की इस अद्भुत दानवीरता से प्रसन्न होकर भगवान श्रीकृष्ण अपने वास्तविक स्वरूप में प्रकट हुए और कर्ण से वरदान मांगने को कहा। कर्ण ने अपने जीवन में मिले अपमान और अन्याय को याद करते हुए कोई व्यक्तिगत वरदान नहीं मांगा। उन्होंने कहा कि "अगले जन्म में आप मेरे वर्ग के लोगों का कल्याण करें।"
कर्ण का यह प्रसंग यह सिखाता है कि सच्ची महानता परिस्थितियों की मोहताज नहीं होती। मृत्यु के द्वार पर खड़ा व्यक्ति भी अगर दूसरों के लिए सोचे, तो वही सच्चा दानवीर कहलाता है। यही कारण है कि आज भी कर्ण को दान, त्याग और करुणा का प्रतीक माना जाता है।