क्यों बांधा जाता है बरगद पेड़ में कच्चा सूत (सौ.सोशल मीडिया)  
धर्म

वट सावित्री पूजा में बरगद पर सात बार ही क्यों लपेटा जाता है कच्चा धागा, अब आया असली वजह, जानिए सनातन धर्म में क्या है इसका महत्व

वट सावित्री व्रत के दिन सुहागिनें बरगद के पेड़ की पूजा करके उसके चारों ओर कच्चा सूत लपेटती हैं और सात परिक्रमा करती हैं। यह परंपरा सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आस्था, प्रेम और अटूट रिश्ते का प्रतीक मानी जाती है।

सीमा कुमारी

आस्था, प्रेम और अटूट रिश्ते का प्रतीक वट सावित्री व्रत सुहागिन महिलाओं के लिए बड़ा महत्व रखता है। इस दिन सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु और सुख सम्रृद्धि के लिए व्रत रखकर वट यानी बरगद के पेड़ की पूजा अर्चना करती है।

हिंदू धर्म में वट यानी बरगद के पेड़ को विशेष पूजनीय माना गया है। खासकर वट सावित्री व्रत के दिन इसका महत्व और भी बढ़ जाता है। मान्यता है कि इस वृक्ष में त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और महेश का वास होता है। इसकी जड़ों को ब्रह्मा, तने को विष्णु और शाखाओं को शिव का रूप माना जाता है।

वट सावित्री व्रत के दिन सुहागिनें बरगद के पेड़ की पूजा करके उसके चारों ओर कच्चा सूत लपेटती हैं और सात परिक्रमा करती हैं।

यह परंपरा सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आस्था, प्रेम और अटूट रिश्ते का प्रतीक मानी जाती है। ऐसे में आइए जानते है वट सावित्री व्रत के दिन बरगद के पेड़ पर सात बार क्यों लपेटा जाता है कच्चा सूत? क्या है धार्मिक महत्व ?

क्यों बांधा जाता है वट सावित्री के दिन बरगद पेड़ में कच्चा सूत?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, वट सावित्री व्रत के दिन महिलाए कई नियमों को पालन करते हुए बरगद पेड़ में कच्चा सूत यानी धागा बांध कर सात बार परिक्रमा करती हैं। इसका मुख्य उद्देश्य है कि, वट वृक्ष में सात बार कच्चा सूत लपेटने से पति-पत्नी का संबंध सात जन्मों तक बना रहता है।

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यह भी कहा जाता है कि, वट सावित्री के दिन बरगद के पेड़ पर कलावा बांधने से अकाल मौत का खतरा भी टल जाता है। इसी कामना को ध्यान रखते हुए महिलाए वट सावित्री के दिन बरगद पेड़ में कच्चा सूत यानी धागा लपेटती है।

 क्या सीख देती है वट सावित्री व्रत की कथा

आपको बता दें, वट सावित्री व्रत और इससे जुड़ी कथा प्राचीन समय से ही प्रचलित है। यह व्रत मुख्य रूप से सुहागिन महिलाओं द्वारा अपने पति की दीर्घायु और अखंड सौभाग्य की कामना के लिए रखा जाता है।

पौराणिक कथा के अनुसार, यमराज ने माता सावित्री के पति सत्यवान के प्राणों को वट वृक्ष के नीचे ही लौटाया था और उन्हें 100 पुत्रों का वरदान दिया था। कहा जाता है कि उसके बाद से ही वट सावित्री व्रत और वट वृक्ष की पूजा की परंपरा शुरू हुई।

वट सावित्री व्रत से जुड़ी यह मान्यता भी कहती है कि, बरगद पेड़ की पूजा करने से यमराज देवता के साथ त्रिदेवों की भी कृपा प्राप्त होती है। इसलिए हिन्दू धर्म में बरगद पेड़ की पूजा का महत्व है।

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