स्कंद षष्ठी (सौ.सोशल मीडिया) 
धर्म

आज है स्कंद षष्ठी, जानिए सनातन धर्म में कार्तिकेय जी की पूजा की क्या है महिमा

Skanda Sashti : भगवान कार्तिकेय को समर्पित स्कंद षष्ठी व्रत हर महीने के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को रखा जाता है। खासतौर पर, दक्षिण भारत में इस पर्व को बहुत ही धूमधाम से मनाया जाता है।

सीमा कुमारी

Skanda Sashti 2025:आज 30 जुलाई को स्कंद षष्ठी का पावन पर्व मनाया जा रहा है। यह पर्व शिव-पार्वती पुत्र भगवान कार्तिकेय को समर्पित है। पंचांग के अनुसार, यह पर्व हर महीने शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि पर मनाई जाती है। खासतौर पर, दक्षिण भारत में इस पर्व को बहुत ही धूमधाम से मनाया जाता है। अभी सावन माह चल रहा है। श्रावण मास को शिव की आराधना के लिए अत्यंत पुण्यकारी माना गया है।

चूंकि भगवान कार्तिकेय, शिव-पार्वती के पुत्र हैं, इसलिए सावन में आने वाली स्कंद षष्ठी का महत्व और अधिक बढ़ जाता है।कहा जाता है कि, सावन महीने में की गई कार्तिकेय उपासना विशेष रूप से मनोकामना पूर्ति, संतान सुख और रोग नाश के लिए मानी जाती है।

ऐसी मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने और पूजा करने से भक्तों को सुख- समृद्धि के साथ-साथ विजय की भी प्राप्ति होती है। ऐसे में आइए जानते है सावन स्कंद षष्ठी की पूजा विधि।

ये है स्कंद षष्ठी शुभ मुहूर्त

आपको बता दें,पंचांग के अनुसार, सावन माह के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि की शुरुआत 30 जुलाई को देर रात 12 बजकर 46 मिनट पर हो रही है। वहीं इस तिथि के समापन की बात की जाए, तो यह 31 जुलाई देर रात 2 बजकर 41 मिनट पर रहने वाली है। ऐसे में सावन माह में स्कंद षष्ठी का पर्व बुधवार 30 जुलाई को मनाया जाएगा।

ऐसे करें शिव-पार्वती पुत्र कार्तिकेय की पूजा

  • स्कंद षष्ठी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि कर लें।
  • इसके बाद स्कंद भगवान का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प धारण करें।
  • अब पूजा स्थल की साफ-सफाई के बाद भगवान कार्तिकेय की मूर्ति या चित्र स्थापित करें।
  • भगवान कार्तिकेय के साथ-साथ भगवान शिव और माता पार्वती का भी चित्र स्थापित करें।
  • पूजा मे कार्तिकेय जी को फूल, चंदन, धूप, दीप और नैवेद्य आदि अर्पित करें।
  • भगवान कार्तिकेय को फल, मिठाई का भोग लगाएं और मोर पंख अर्पित करें।
  • अंत में स्कंद भगवान की आरती क करें और सभी लोगों में प्रसाद बांटें।

स्कंद षष्ठी व्रत का क्या है महत्व

सनातन धर्म में स्कंद षष्ठी व्रत का विशेष महत्व है। भगवान स्कंद को युद्ध का देवता कहा जाता है। उन्होंने ही तारकासुर जैसे दैत्यों का संहार कर देवताओं की रक्षा की थी। ऐसा कहा जाता है कि, यह व्रत शत्रु नाश, संतान सुख, और मानसिक दृढ़ता प्राप्ति के लिए अत्यंत फलदायी माना जाता है।

दक्षिण भारत विशेषकर तमिलनाडु में इसे बहुत बड़े स्तर पर मनाया जाता है और मुरुगन मंदिरों में विशेष आयोजन होते हैं। इसे धर्म की विजय और अधर्म के विनाश का प्रतीक पर्व माना जाता है।

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