Ancient Durga Temples In Kashi: शारदीय नवरात्रि में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा-अर्चना की जाती है। धार्मिक नगरी वाराणसी यानी काशी में नवदुर्गा यात्रा की विशेष परंपरा है।
यहां मां शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री के मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था के प्रमुख केंद्र हैं। नवरात्रि के अलग-अलग दिनों में भक्त इन मंदिरों में दर्शन और पूजन के लिए पहुंचते हैं। आइए जानते हैं इन प्राचीन मंदिरों की खासियत और उनसे जुड़ी धार्मिक मान्यताओं के बारे में।
देश में मां शैलपुत्री का सबसे प्रमुख, पौराणिक और जागृत मंदिर काशी (वाराणसी) में वाराणसी सिटी रेलवे स्टेशन से लगभग 2 से 4 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। काशी खंड और स्कंद पुराण में इस मंदिर का विशेष उल्लेख मिलता है। यह मंदिर बनारस की तंग और घुमावदार गलियों के बीच स्थित है। यहाँ नवरात्रि के पहले दिन (प्रतिपदा) लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है और मुख्य मार्ग से ऑटो, रिक्शा या पैदल पहुँचा जा सकता है। ऐसा विश्वास है कि यहाँ दर्शन मात्र से ही साधक के जीवन के समस्त अवरोध दूर हो जाते हैं।
देश में मां ब्रह्मचारिणी का सबसे प्रमुख, पौराणिक और जागृत मंदिर काशी में गंगा किनारे बालाजी घाट पर स्थित है। काशी खंड और स्कंद पुराण में इस मंदिर का विशेष उल्लेख मिलता है। यह मंदिर बनारस की तंग और घुमावदार गलियों के बीच सप्तसागर क्षेत्र में स्थित है। यहाँ नवरात्रि के दूसरे दिन लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। ऐसा विश्वास है कि यहाँ दर्शन मात्र से ही संतान सुख की प्राप्ति होती है और साधक के जीवन के समस्त अवरोध दूर हो जाते हैं।
देश में मां चंद्रघंटा का सबसे प्रमुख और अति प्राचीन मंदिर बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी (वाराणसी) के चौक क्षेत्र के अंतर्गत चंद्रघंटा गली में स्थित है। काशी खंड के अनुसार, नवदुर्गा यात्रा में तीसरे दिन इस मंदिर में दर्शन करना अनिवार्य है। माना जाता है कि माता की यह विग्रह मूर्ति अत्यंत जागृत है। मान्यता है कि यहाँ भोर की आरती में शामिल होने या केवल माता के मुखमंडल के दर्शन करने से व्यक्ति के जन्म-जन्मांतर के पाप कट जाते हैं और उसे हर प्रकार के संकट से मुक्ति मिलती है।
धार्मिक नगरी वाराणसी के दुर्गाकुंड इलाके में स्थित ऐतिहासिक श्रीमद् दुर्गा माता मंदिर वास्तव में काशी की मां कूष्मांडा देवी को ही समर्पित है। लाल पत्थरों से नागर शैली में बने इस भव्य मंदिर का निर्माण सन 1760 में बंगाल की रानी भवानी ने करवाया था। स्कंद पुराण के अनुसार, यह मंदिर अत्यंत जाज्वल्यमान शक्तिपीठ है। मान्यता है कि शुंभ-निशुंभ का वध करने के बाद माता ने इसी स्थान पर विश्राम किया था। यहाँ स्थापित माता की प्रतिमा को 'स्वयंभू' माना जाता है और माता यहाँ अदृश्य रूप से एक 'बीसा यंत्र' में विराजमान हैं। नवरात्रि के चौथे दिन यहाँ लाखों की संख्या में श्रद्धालु कतारों में खड़े होकर दर्शन करते हैं।
आध्यात्मिक नगरी वाराणसी के जैतपुरा क्षेत्र में मां स्कंदमाता का देश का सबसे प्रसिद्ध और पौराणिक मंदिर स्थित है। स्कंद पुराण के काशी खंड के अनुसार, नवदुर्गा यात्रा के पांचवें दिन इस मंदिर के दर्शन का विशेष महात्म्य है। इस मंदिर के बारे में यह अटूट विश्वास है कि जो दंपत्ति संतान सुख से वंचित हैं, वे यदि शारदीय नवरात्रि की पंचमी को यहाँ आकर माता की गोद खाली न रहने की प्रार्थना करते हैं, तो माता उनकी झोली अवश्य भर देती हैं।
बाबा विश्वनाथ की नगरी वाराणसी के सिंधिया घाट की तंग गलियों में मां कात्यायनी का एक अति प्राचीन विग्रह स्थापित है। स्कंद पुराण के काशी खंड के अनुसार, नवदुर्गा यात्रा के छठे दिन इस मंदिर के दर्शन का विशेष महात्म्य है। मान्यता है कि यहाँ दर्शन करने से कुंडली के सभी प्रकार के ग्रह दोष, विशेषकर बृहस्पति जनित दोष शांत हो जाते हैं।
देश में मां महागौरी का सबसे प्रमुख और पौराणिक मंदिर मोक्ष नगरी वाराणसी के गोदौलिया-लक्सा रोड क्षेत्र में स्थित है। स्कंद पुराण के काशी खंड के अनुसार, नवदुर्गा यात्रा के आठवें दिन इस मंदिर के दर्शन का विशेष महात्म्य है। यहाँ माता का विग्रह अत्यंत दिव्य और ममतामयी है। मान्यता है कि यहाँ दर्शन करने से वैवाहिक जीवन के सारे कष्ट दूर हो जाते हैं और अटूट सौभाग्य की प्राप्ति होती है।
देश में मां कालरात्रि का सबसे सिद्ध और प्राचीन पौराणिक मंदिर उत्तर प्रदेश के वाराणसी में ललिता घाट की कालिका गली के पास स्थित है। स्कंद पुराण के काशी खंड के अनुसार, नवदुर्गा यात्रा के सातवें दिन इस मंदिर के दर्शन का सर्वोच्च महत्व है। मान्यता है कि इस मंदिर में केवल दर्शन करने से ही भक्तों के ऊपर से काली शक्तियों का साया, तंत्र-मंत्र का असर और अकाल मृत्यु का योग हमेशा के लिए टल जाता है।
देश में मां सिद्धिदात्री का सबसे प्रमुख और पौराणिक मंदिर मोक्ष नगरी वाराणसी के गोलघर (मैदागिन के समीप) क्षेत्र में स्थित है। स्कंद पुराण के काशी खंड के अनुसार, नवदुर्गा यात्रा के अंतिम दिन इस मंदिर के दर्शन के बिना नवरात्रि पूर्ण नहीं मानी जाती। यहाँ माता को 'सिद्धमाता' के नाम से पूजा जाता है। महानवमी के दिन यहाँ श्रद्धालुओं का विशाल सैलाब उमड़ता है। मान्यता है कि यहाँ दर्शन करने से साधक की हर मनोकामना शीघ्र पूरी होती है।